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रामायण >> श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (अयोध्याकाण्ड) श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (अयोध्याकाण्ड)गोस्वामी तुलसीदास
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भारत की सर्वाधिक प्रचलित रामायण। द्वितीय सोपान अयोध्याकाण्ड
अस कहि पग परिपेम अति सिय हित बिनय सुनाइ।
सिय समेत सियमातु तब चली सुआयसु पाइ॥२८५॥
सिय समेत सियमातु तब चली सुआयसु पाइ॥२८५॥
ऐसा कहकर बड़े प्रेम से पैरों पड़कर सीताजी [को साथ भेजने] के लिये विनती करके
और सुन्दर आज्ञा पाकर तब सीताजी समेत सीताजी की माता डेरे को चलीं।।२८५ ॥
प्रिय परिजनहि मिली बैदेही।
जो जेहि जोगु भाँति तेहि तेही॥
तापस बेष जानकी देखी।
भा सबु बिकल बिषाद बिसेषी।
जो जेहि जोगु भाँति तेहि तेही॥
तापस बेष जानकी देखी।
भा सबु बिकल बिषाद बिसेषी।
जानकी जी अपने प्यारे कुटुम्बियों से-जो जिस योग्य था, उससे उसी प्रकार मिलीं।
जानकीजी को तपस्विनी के वेष में देखकर सभी शोक से अत्यन्त व्याकुल हो गये ॥१॥
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