रामायण >> श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (अयोध्याकाण्ड)

श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (अयोध्याकाण्ड)

गोस्वामी तुलसीदास

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2020
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पुस्तक क्रमांक : 10
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भारत की सर्वाधिक प्रचलित रामायण। द्वितीय सोपान अयोध्याकाण्ड

बेगि पाउ धारिअ थलहि कह सनेहँ सतिभाय।
हमरें तौ अब ईस गति कै मिथिलेस सहाय॥२८४॥


और प्रेमसहित सद्भावसे बोलीं-अब आप शीघ्र डेरेको पधारिये। हमारे तो अब ईश्वर ही गति हैं, अथवा मिथिलेश्वर जनकजी सहायक हैं ॥ २८४॥

लखि सनेह सुनि बचन बिनीता।
जनकप्रिया गह पाय पुनीता।
देबि उचित असि बिनय तुम्हारी।
दसरथ घरिनि राम महतारी॥


कौसल्याजीके प्रेमको देखकर और उनके विनम्र वचनोंको सुनकर जनकजीकी प्रिय पत्नीने उनके पवित्र चरण पकड़ लिये और कहा-हे देवि! आप राजा दशरथजीकी रानी और श्रीरामजीकी माता हैं। आपकी ऐसी नम्रता उचित ही है ॥१॥

प्रभु अपने नीचहु आदरहीं।
अगिनि धूम गिरि सिर तिनु धरहीं॥
सेवकु राउ करम मन बानी।
सदा सहाय महेसु भवानी॥


प्रभु अपने नीच जनोंका भी आदर करते हैं। अग्नि धुएँको और पर्वत तृण (घास) को अपने सिर पर धारण करते हैं। हमारे राजा तो कर्म, मन और वाणीसे आपके सेवक हैं और सदा सहायक तो श्रीमहादेव-पार्वतीजी हैं ॥२॥

रउरे अंग जोगु जग को है।
दीप सहाय कि दिनकर सोहै।
रामु जाइ बनु करि सुर काजू।
अचल अवधपुर करिहहिं राजू॥


आपका सहायक होने योग्य जगत्में कौन है? दीपक सूर्य की सहायता करने जाकर कहीं शोभा पा सकता है? श्रीरामचन्द्रजी वनमें जाकर देवताओं का कार्य करके अवधपुरीमें अचल राज्य करेंगे॥३॥

अमर नाग नर राम बाहुबल।
सुख बसिहहिं अपनें अपनें थल॥
यह सब जागबलिक कहि राखा।
देबि न होइ मुधा मुनि भाषा॥


देवता, नाग और मनुष्य सब श्रीरामचन्द्रजी की भुजाओंके बलपर अपने-अपने स्थानों (लोकों) में सुखपूर्वक बसेंगे। यह सब याज्ञवल्क्य मुनि ने पहले ही से कह रखा है। हे देवि! मुनि का कथन व्यर्थ (झूठा) नहीं हो सकता ॥४॥

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