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रामायण >> श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (अयोध्याकाण्ड) श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (अयोध्याकाण्ड)गोस्वामी तुलसीदास
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भारत की सर्वाधिक प्रचलित रामायण। द्वितीय सोपान अयोध्याकाण्ड
जनक-सुनयना-संवाद, भरतजी की महिमा
सुनि भूपाल भरत ब्यवहारू।
सोन सुगंध सुधा ससि सारू॥
मूदे सजल नयन पुलके तन।
सुजसु सराहन लगे मुदित मन।
सोन सुगंध सुधा ससि सारू॥
मूदे सजल नयन पुलके तन।
सुजसु सराहन लगे मुदित मन।
सोनेमें सुगंध और [समुद्रसं निकली हुई] सुधामें चन्द्रमाके सार अमृतके समान
भरतजीका व्यवहार सुनकर राजाने [प्रेमविह्वल होकर अपने [प्रेमाश्रुओंके] जलसे
भरे नेत्रोंको मूंद लिया (वे भरतजीके प्रेममें मानो ध्यानस्थ हो गये)। वे
शरीरसे पुलकित हो गये और मनमें आनन्दित होकर भरतजीके सुन्दर यशकी सराहना करने
लगे॥१॥
सावधान सुनु सुमुखि सुलोचनि।
भरत कथा भव बंध बिमोचनि॥
धरम राजनय ब्रह्मबिचारू।
इहाँ जथामति मोर प्रचारू।
भरत कथा भव बंध बिमोचनि॥
धरम राजनय ब्रह्मबिचारू।
इहाँ जथामति मोर प्रचारू।
[वे बोले-] हे सुमुखि! हे सुनयनी! सावधान होकर सुनो। भरतजी की कथा संसारके
बन्धन से छुड़ाने वाली है। धर्म, राजनीति और ब्रह्मविचार-इन तीनों विषयों में
अपनी बुद्धिके अनुसार मेरी [थोड़ी-बहुत] गति है। (अर्थात् इनके सम्बन्ध में मैं
कुछ जानता हूँ)॥२॥
सो मति मोरि भरत महिमाही।
कहै काह छलि छुअति न छाँही॥
बिधि गनपति अहिपति सिव सारद।
कबि कोबिद बुध बुद्धि बिसारद॥
कहै काह छलि छुअति न छाँही॥
बिधि गनपति अहिपति सिव सारद।
कबि कोबिद बुध बुद्धि बिसारद॥
वह (धर्म, राजनीति और ब्रह्मज्ञानमें प्रवेश रखनेवाली) मेरी बुद्धि भरतजीकी
महिमाका वर्णन तो क्या करे, छल करके भी उसकी छायातकको नहीं छू पाती! ब्रह्माजी,
गणेशजी, शेषजी, महादेवजी, सरस्वतीजी, कवि, ज्ञानी, पण्डित और बुद्धिमान्- |॥३॥
भरत चरित कीरति करतूती।
धरम सील गुन बिमल बिभूती॥
समुझत सुनत सुखद सब काहू।
सुचि सुरसरि रुचि निदर सुधाहू॥
धरम सील गुन बिमल बिभूती॥
समुझत सुनत सुखद सब काहू।
सुचि सुरसरि रुचि निदर सुधाहू॥
सब किसी को भरतजी के चरित्र, कीर्ति, करनी, धर्म, शील, गुण और निर्मल ऐश्वर्य
समझने में और सुनने में सुख देनेवाले हैं और पवित्रता में गङ्गाजी का तथा स्वाद
(मधुरता) में अमृत का भी तिरस्कार करनेवाले हैं ॥४॥
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