रामायण >> श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (अयोध्याकाण्ड)

श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (अयोध्याकाण्ड)

गोस्वामी तुलसीदास

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2020
पृष्ठ :0
मुखपृष्ठ :
पुस्तक क्रमांक : 10
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भारत की सर्वाधिक प्रचलित रामायण। द्वितीय सोपान अयोध्याकाण्ड

निरवधि गुन निरुपम पुरुषु भरतु भरत सम जानि।
कहिअ सुमेरु कि सेर सम कबिकुल मति सकुचानि॥२८८॥


भरतजी असीम गुणसम्पन्न और उपमारहित पुरुष हैं। भरतजीके समान बस, भरतजी ही हैं, ऐसा जानो। सुमेरु पर्वतको क्या सेरके बराबर कह सकते हैं? इसलिये (उन्हें किसी पुरुषके साथ उपमा देनेमें) कविसमाजकी बुद्धि भी सकुचा गयी!॥२८८॥

अगम सबहि बरनत बरबरनी।
जिमि जलहीन मीन गमु धरनी॥
भरत अमित महिमा सुनु रानी।
जानहिं रामु न सकहिं बखानी॥


हे श्रेष्ठ वर्णवाली! भरतजीकी महिमाका वर्णन करना सभीके लिये वैसे ही अगम है जैसे जलरहित पृथ्वीपर मछलीका चलना। हे रानी! सुनो, भरतजीकी अपरिमित महिमाको एक श्रीरामचन्द्रजी ही जानते हैं; किन्तु वे भी उसका वर्णन नहीं कर सकते॥१॥

बरनि सप्रेम भरत अनुभाऊ।
तिय जिय की रुचि लखि कह राऊ॥
बहुरहिं लखनु भरतु बन जाहीं।
सब कर भल सबके मन माहीं॥


इस प्रकार प्रेमपूर्वक भरतजीके प्रभावका वर्णन करके, फिर पत्रीके मनकी रुचि जानकर राजाने कहा-लक्ष्मणजी लौट जायँ और भरतजी वनको जायँ, इसमें सभीका भला है और यही सबके मनमें है॥२॥

देबि परंतु भरत रघुबर की।
प्रीति प्रतीति जाइ नहिं तरकी॥
भरतु अवधि सनेह ममता की।
जद्यपि रामु सीम समता की।


परन्तु हे देवि! भरतजी और श्रीरामचन्द्रजीका प्रेम और एक-दूसरेपर विश्वास, बुद्धि और विचारकी सीमामें नहीं आ सकता। यद्यपि श्रीरामचन्द्रजी समताकी सीमा हैं, तथापि भरतजी प्रेम और ममताकी सीमा हैं ॥३॥

परमारथ स्वारथ सुख सारे।
भरत न सपनेहुँ मनहुँ निहारे॥
साधन सिद्धि राम पग नेहू।
मोहि लखि परत भरत मत एहू॥


[श्रीरामचन्द्रजीके प्रति अनन्य प्रेमको छोड़कर] भरतजीने समस्त परमार्थ, स्वार्थ और सुखोंकी ओर स्वप्नमें भी मनसे भी नहीं ताका है। श्रीरामजीके चरणोंका प्रेम ही उनका साधन है और वही सिद्धि है। मुझे तो भरतजीका बस, यही एकमात्र सिद्धान्त जान पड़ता है॥४॥

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