|
रामायण >> श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (अयोध्याकाण्ड) श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (अयोध्याकाण्ड)गोस्वामी तुलसीदास
|
|
||||||
भारत की सर्वाधिक प्रचलित रामायण। द्वितीय सोपान अयोध्याकाण्ड
ग्यान निधान सुजान सुचि धरम धीर नरपाल।
तुम्ह बिनु असमंजस समन को समरथ एहि काल॥२९१॥
तुम्ह बिनु असमंजस समन को समरथ एहि काल॥२९१॥
हे राजन् ! तुम ज्ञानके भण्डार, सुजान, पवित्र और धर्ममें धीर हो। इस समय
तुम्हारे बिना इस दुविधाको दूर करनेमें और कौन समर्थ है ? ॥ २९१ ॥
सुनि मुनि बचन जनक अनुरागे।
लखि गति ग्यानु बिरागु बिरागे॥
सिथिल सनेहँ गुनत मन माहीं।
आए इहाँ कीन्ह भल नाहीं।।
लखि गति ग्यानु बिरागु बिरागे॥
सिथिल सनेहँ गुनत मन माहीं।
आए इहाँ कीन्ह भल नाहीं।।
मुनि वसिष्ठजीके वचन सुनकर जनकजी प्रेममें मग्न हो गये। उनकी दशा देखकर ज्ञान
और वैराग्यको भी वैराग्य हो गया (अर्थात् उनके ज्ञान-वैराग्य छूट-से गये)। वे
प्रेमसे शिथिल हो गये और मनमें विचार करने लगे कि हम यहाँ आये, यह अच्छा नहीं
किया॥१॥
रामहि रायँ कहेउ बन जाना।
कीन्ह आपु प्रिय प्रेम प्रवाना॥
हम अब बन तें बनहि पठाई।
प्रमुदित फिरब बिबेक बड़ाई।
कीन्ह आपु प्रिय प्रेम प्रवाना॥
हम अब बन तें बनहि पठाई।
प्रमुदित फिरब बिबेक बड़ाई।
राजा दशरथजी ने श्रीरामजी को वन जाने के लिये कहा और स्वयं अपने प्रिय के प्रेम
को प्रमाणित (सच्चा) कर दिया (प्रियवियोगमें प्राण त्याग दिये)। परन्तु हम अब
इन्हें वनसे [और गहन] वनको भेजकर अपने विवेक की बड़ाई में आनन्दित होते हुए
लौटेंगे[कि हमें जरा भी मोह नहीं है; हम श्रीरामजी को वनमें छोड़कर चले आये,
दशरथजी की तरह मरे नहीं!] ॥ २॥
तापस मुनि महिसुर सुनि देखी।
भए प्रेम बस बिकल बिसेषी॥
समउ समुझि धरि धीरजु राजा।
चले भरत पहिं सहित समाजा॥
भए प्रेम बस बिकल बिसेषी॥
समउ समुझि धरि धीरजु राजा।
चले भरत पहिं सहित समाजा॥
तपस्वी, मुनि और ब्राह्मण यह सब सुन और देखकर प्रेमवश बहुत ही व्याकुल हो गये।
समय का विचार करके राजा जनकजी धीरज धरकर समाजसहित भरतजी के पास चले ॥३॥
भरत आइ आगे भइ लीन्हे।
अवसर सरिस सुआसन दीन्हे॥
तात भरत कह तेरहुति राऊ।
तुम्हहि बिदित रघुबीर सुभाऊ॥
अवसर सरिस सुआसन दीन्हे॥
तात भरत कह तेरहुति राऊ।
तुम्हहि बिदित रघुबीर सुभाऊ॥
भरतजीने आकर उन्हें आगे होकर लिया (सामने आकर उनका स्वागत किया) और समयानुकूल
अच्छे आसन दिये। तिरहुतराज जनकजी कहने लगे हे तात भरत! तुमको श्रीरामजीका
स्वभाव मालूम ही है ॥ ४॥
|
|||||
लोगों की राय
No reviews for this book






