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रामायण >> श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (अयोध्याकाण्ड) श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (अयोध्याकाण्ड)गोस्वामी तुलसीदास
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भारत की सर्वाधिक प्रचलित रामायण। द्वितीय सोपान अयोध्याकाण्ड
जनक-वसिष्ठादि-संवाद
प्रान प्रान के जीव के जिव सुख के सुख राम।
तुम्ह तजि तात सोहात गृह जिन्हहि तिन्हहि बिधि बाम ॥२९०॥
तुम्ह तजि तात सोहात गृह जिन्हहि तिन्हहि बिधि बाम ॥२९०॥
हे राम! तुम प्राणोंके भी प्राण, आत्माके भी आत्मा और सुखके भी सुख हो। हे तात!
तुम्हें छोड़कर जिन्हें घर सुहाता है, उन्हें विधाता विपरीत है।। २९०॥
सो सुखु करमु धरमु जरि जाऊ।
जहँ न राम पद पंकज भाऊ॥
जोगु कुजोगु ग्यानु अग्यानू।
जहँ नहिं राम पेम परधानू॥
जहँ न राम पद पंकज भाऊ॥
जोगु कुजोगु ग्यानु अग्यानू।
जहँ नहिं राम पेम परधानू॥
जहाँ श्रीरामके चरणकमलोंमें प्रेम नहीं है, वह सुख, कर्म और धर्म जल जाय।
जिसमें श्रीरामप्रेमकी प्रधानता नहीं है, वह योग कुयोग है और वह ज्ञान अज्ञान
है॥१॥
तुम्ह बिनु दुखी सुखी तुम्ह तेहीं।
तुम्ह जानहु जिय जो जेहि केहीं॥
राउर आयसु सिर सबही कें।
बिदित कृपालहि गति सब नीकें।
तुम्ह जानहु जिय जो जेहि केहीं॥
राउर आयसु सिर सबही कें।
बिदित कृपालहि गति सब नीकें।
तुम्हारे बिना ही सब दुःखी हैं और जो सुखी हैं वे तुम्हींसे सुखी हैं। जिस
किसीके जीमें जो कुछ है तुम सब जानते हो। आपकी आज्ञा सभीके सिरपर है।
कृपालु (आप) को सभीकी स्थिति अच्छी तरह मालूम है।। २।।। आपु आश्रमहि धारिअ पाऊ।
भयउ सनेह सिथिल मुनिराऊ॥
करि प्रनामु तब रामु सिधाए।
रिषि धरि धीर जनक पहिं आए।
भयउ सनेह सिथिल मुनिराऊ॥
करि प्रनामु तब रामु सिधाए।
रिषि धरि धीर जनक पहिं आए।
अत: आप आश्रमको पधारिये। इतना कह मुनिराज स्नेहसे शिथिल हो गये। तब श्रीरामजी
प्रणाम करके चले गये और ऋषि वसिष्ठजी धीरज धरकर जनकजीके पास आये॥३॥
राम बचन गुरु नृपहि सुनाए।
सील सनेह सुभायँ सुहाए।
महाराज अब कीजिअ सोई।
सब कर धरम सहित हित होई॥
सील सनेह सुभायँ सुहाए।
महाराज अब कीजिअ सोई।
सब कर धरम सहित हित होई॥
गुरुजीने श्रीरामचन्द्रजीके शील और स्नेहसे युक्त स्वभावसे ही सुन्दर वचन राजा
जनकजीको सुनाये [और कहा-] हे महाराज! अब वही कीजिये जिसमें सबका धर्मसहित हित
हो॥४॥
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