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रामायण >> श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (अयोध्याकाण्ड) श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (अयोध्याकाण्ड)गोस्वामी तुलसीदास
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भारत की सर्वाधिक प्रचलित रामायण। द्वितीय सोपान अयोध्याकाण्ड
रामु सनेह सकोच बस कह ससोच सुरराजु।
रचहु प्रपंचहि,पंच मिलि नाहिं त भयउ अकाजु॥२९४॥
रचहु प्रपंचहि,पंच मिलि नाहिं त भयउ अकाजु॥२९४॥
देवराज इन्द्र सोचमें भरकर कहने लगे कि श्रीरामचन्द्रजी तो स्नेह और संकोचके
वशमें हैं। इसलिये सब लोग मिलकर कुछ प्रपञ्च (माया) रचो; नहीं तो काम बिगड़ा
[ही समझो] ॥२९४॥
सुरन्ह सुमिरि सारदा सराही।
देबि देव सरनागत पाही॥
फेरि भरत मति करि निज माया।
पालु बिबुध कुल करि छल छाया॥
देबि देव सरनागत पाही॥
फेरि भरत मति करि निज माया।
पालु बिबुध कुल करि छल छाया॥
देवताओंने सरस्वतीका स्मरण कर उनकी सराहना (स्तुति) की और कहा-हे देवि! देवता
आपके शरणागत हैं, उनकी रक्षा कीजिये। अपनी माया रचकर भरतजीकी बुद्धिको फेर
दीजिये। और छलकी छाया कर देवताओंके कुलका पालन (रक्षा) कीजिये॥१॥
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