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रामायण >> श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (अयोध्याकाण्ड) श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (अयोध्याकाण्ड)गोस्वामी तुलसीदास
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भारत की सर्वाधिक प्रचलित रामायण। द्वितीय सोपान अयोध्याकाण्ड
सरस्वती का इन्द्र को समझाना
बिबुध बिनय सुनि देबि सयानी।
बोली सुर स्वारथ जड़ जानी॥
मो सन कहहु भरत मति फेरू।
लोचन सहस न सूझ सुमेरू॥
बोली सुर स्वारथ जड़ जानी॥
मो सन कहहु भरत मति फेरू।
लोचन सहस न सूझ सुमेरू॥
देवताओंकी विनती सुनकर और देवताओंको स्वार्थके वश होनेसे मूर्ख जानकर बुद्धिमती
सरस्वतीजी बोलीं-मुझसे कह रहे हो कि भरतजीकी मति पलट दो ! हजार नेत्रोंसे भी
तुमको सुमेरु नहीं सूझ पड़ता!॥२॥
बिधि हरि हर माया बड़ि भारी।
सोउ न भरत मति सकइ निहारी॥
सो मति मोहि कहत करु भोरी।
चंदिनि कर कि चंडकर चोरी॥
सोउ न भरत मति सकइ निहारी॥
सो मति मोहि कहत करु भोरी।
चंदिनि कर कि चंडकर चोरी॥
ब्रह्मा, विष्णु और महेशकी माया बड़ी प्रबल है ! किन्तु वह भी भरतजीकी बुद्धिकी
ओर ताक नहीं सकती। उस बुद्धिको, तुम मुझसे कह रहे हो कि भोली कर दो (भुलावेमें
डाल दो)! अरे ! चाँदनी कहीं प्रचण्ड किरणवाले सूर्य को चुरा सकती है?॥३॥
भरत हृदयँ सिय राम निवासू।
तहँ कि तिमिर जहँ तरनि प्रकासू॥
अस कहि सारद गइ बिधि लोका।
बिबुध बिकल निसि मानहुँ कोका॥
तहँ कि तिमिर जहँ तरनि प्रकासू॥
अस कहि सारद गइ बिधि लोका।
बिबुध बिकल निसि मानहुँ कोका॥
भरतजीके हृदयमें श्रीसीतारामजीका निवास है। जहाँ सूर्य का प्रकाश है, वहाँ कहीं
अँधेरा रह सकता है? ऐसा कहकर सरस्वतीजी ब्रह्मलोक को चली गयीं। देवता ऐसे
व्याकुल हुए जैसे रात्रिमें चकवा व्याकुल होता है।। ४॥
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