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रामायण >> श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (अयोध्याकाण्ड) श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (अयोध्याकाण्ड)गोस्वामी तुलसीदास
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भारत की सर्वाधिक प्रचलित रामायण। द्वितीय सोपान अयोध्याकाण्ड
सुर स्वारथी मलीन मन कीन्ह कुमंत्र कुठाटु।
रचि प्रपंच माया प्रबल भय भ्रम अरति उचाटु॥२९५॥
रचि प्रपंच माया प्रबल भय भ्रम अरति उचाटु॥२९५॥
मलिन मनवाले स्वार्थी देवताओंने बुरी सलाह करके बुरा ठाट (षड्यन्त्र) रचा।
प्रबल मायाजाल रचकर भय, भ्रम, अप्रीति और उच्चाटन फैला दिया ॥ २९५ ॥
करि कुचालि सोचत सुरराजू।
भरत हाथ सबु काजु अकाजू॥
गए जनकु रघुनाथ समीपा।
सनमाने सब रबिकुल दीपा॥
भरत हाथ सबु काजु अकाजू॥
गए जनकु रघुनाथ समीपा।
सनमाने सब रबिकुल दीपा॥
कुचाल करके देवराज इन्द्र सोचने लगे कि कामका बनना-बिगड़ना सब भरतजीके हाथ है।
इधर राजा जनकजी [मुनि वसिष्ठ आदिके साथ] श्रीरघुनाथजीके पास गये। सूर्यकुलके
दीपक श्रीरामचन्द्रजीने सबका सम्मान किया, ॥१॥
समय समाज धरम अबिरोधा।
बोले तब रघुबंस पुरोधा।
जनक भरत संबादु सुनाई।
भरत कहाउति कही सुहाई॥
बोले तब रघुबंस पुरोधा।
जनक भरत संबादु सुनाई।
भरत कहाउति कही सुहाई॥
तब रघुकुलके पुरोहित वसिष्ठजी समय, समाज और धर्मके अविरोधी (अर्थात् अनुकूल)
वचन बोले। उन्होंने पहले जनकजी और भरतजीका संवाद सुनाया। फिर भरतजीकी कही हुई
सुन्दर बातें कह सुनायीं ॥२॥
तात राम जस आयस देह।
सो सब करे मोर मत एह।।
सुनि रघुनाथ जोरि जुग पानी।
बोले सत्य सरल मृदु बानी॥
सो सब करे मोर मत एह।।
सुनि रघुनाथ जोरि जुग पानी।
बोले सत्य सरल मृदु बानी॥
[फिर बोले-] हे तात राम! मेरा मत तो यह है कि तुम जैसी आज्ञा दो, वैसी ही सब
करें! यह सुनकर दोनों हाथ जोड़कर श्रीरघुनाथजी सत्य, सरल और कोमल वाणी बोले-
॥३॥
बिद्यमान आपुनि मिथिलेसू।
मोर कहब सब भाँति भदेसू॥
राउर राय रजायसु होई।
राउरि सपथ सही सिर सोई॥
मोर कहब सब भाँति भदेसू॥
राउर राय रजायसु होई।
राउरि सपथ सही सिर सोई॥
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