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रामायण >> श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (अयोध्याकाण्ड) श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (अयोध्याकाण्ड)गोस्वामी तुलसीदास
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भारत की सर्वाधिक प्रचलित रामायण। द्वितीय सोपान अयोध्याकाण्ड
भरत राम संबादु सुनि सकल सुमंगल मूल।
सुर स्वारथी सराहि कुल बरषत सुरतरु फूल॥३०८॥
सुर स्वारथी सराहि कुल बरषत सुरतरु फूल॥३०८॥
समस्त सुन्दर मङ्गलोंका मूल भरतजी और श्रीरामचन्द्रजीका संवाद सुनकर स्वार्थी
देवता रघुकुलकी सराहना करके कल्पवृक्षके फूल बरसाने लगे॥३०८॥
धन्य भरत जय राम गोसाईं।
कहत देव हरषत बरिआईं।
मुनि मिथिलेस सभाँ सब काहू।
भरत बचन सुनि भयउ उछाहू॥
कहत देव हरषत बरिआईं।
मुनि मिथिलेस सभाँ सब काहू।
भरत बचन सुनि भयउ उछाहू॥
'भरतजी धन्य हैं, स्वामी श्रीरामजीकी जय हो!' ऐसा कहते हुए देवता बलपूर्वक
(अत्यधिक) हर्षित होने लगे। भरतजीके वचन सुनकर मुनि वसिष्ठजी, मिथिलापति जनकजी
और सभामें सब किसीको बड़ा उत्साह (आनन्द) हुआ॥१॥
भरत राम गुन ग्राम सनेहू।
पुलकि प्रसंसत राउ बिदेहू ॥
सेवक स्वामि सुभाउ सुहावन।
नेमु पेमु अति पावन पावन।
पुलकि प्रसंसत राउ बिदेहू ॥
सेवक स्वामि सुभाउ सुहावन।
नेमु पेमु अति पावन पावन।
भरतजी और श्रीरामचन्द्रजीके गुणसमूहकी तथा प्रेमकी विदेहराज जनकजी पुलकित होकर
प्रशंसा कर रहे हैं। सेवक और स्वामी दोनोंका सुन्दर स्वभाव है। इनके नियम और
प्रेम पवित्रको भी अत्यन्त पवित्र करनेवाले हैं ॥ २॥
मति अनुसार सराहन लागे।
सचिव सभासद सब अनुरागे॥
सुनि सुनि राम भरत संबादू।
दुहु समाज हियँ हरषु बिषादू॥
सचिव सभासद सब अनुरागे॥
सुनि सुनि राम भरत संबादू।
दुहु समाज हियँ हरषु बिषादू॥
मन्त्री और सभासद सभी प्रेममुग्ध होकर अपनी-अपनी बुद्धिके अनुसार सराहना करने
लगे। श्रीरामचन्द्रजी और भरतजीका संवाद सुन-सुनकर दोनों समाजोंके हृदयोंमें
हर्ष और विषाद (भरतजीके सेवाधर्मको देखकर हर्ष और रामवियोगकी सम्भावनासे विषाद)
दोनों हुए ॥३॥
राम मातु दुखु सुखु सम जानी।
कहि गुन राम प्रबोधी रानी॥
एक कहहिं रघुबीर बड़ाई।
एक सराहत भरत भलाई॥
कहि गुन राम प्रबोधी रानी॥
एक कहहिं रघुबीर बड़ाई।
एक सराहत भरत भलाई॥
श्रीरामचन्द्रजीकी माता कौसल्याजीने दुःख और सुखको समान जानकर श्रीरामजीके गुण
कहकर दूसरी रानियोंको धैर्य बँधाया। कोई श्रीरामजीकी बड़ाई (बड़प्पन) की चर्चा
कर रहे हैं, तो कोई भरतजीके अच्छेपनकी सराहना करते हैं ॥ ४॥
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