रामायण >> श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (अयोध्याकाण्ड)

श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (अयोध्याकाण्ड)

गोस्वामी तुलसीदास

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2020
पृष्ठ :0
मुखपृष्ठ :
पुस्तक क्रमांक : 10
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भारत की सर्वाधिक प्रचलित रामायण। द्वितीय सोपान अयोध्याकाण्ड

अत्रि कहेउ तब भरत सन सैल समीप सुकूप।
राखिअ तीरथ तोय तहँ पावन अमिअ अनूप॥३०९॥

तब अत्रिजीने भरतजीसे कहा-इस पर्वतके समीप ही एक सुन्दर कुआँ है। इस पवित्र, अनुपम और अमृत-जैसे तीर्थजलको उसीमें स्थापित कर दीजिये॥ ३०९॥

भरत अत्रि अनुसासन पाई।
जल भाजन सब दिए चलाई।
सानुज आपु अत्रि मुनि साधू।
सहित गए जहँ कूप अगाधू॥

भरतजीने अत्रिमुनिकी आज्ञा पाकर जलके सब पात्र रवाना कर दिये और छोटे भाई शत्रुघ्न, अत्रिमुनि तथा अन्य साधु-सन्तोंसहित आप वहाँ गये जहाँ वह अथाह कुआँ था ॥१॥

पावन पाथ पुन्यथल राखा।
प्रमुदित प्रेम अत्रि अस भाषा॥
तात अनादि सिद्ध थल एहू।
लोपेउ काल बिदित नहिं केहू॥

और उस पवित्र जलको उस पुण्यस्थलमें रख दिया। तब अत्रि ऋषिने प्रेमसे आनन्दित होकर ऐसा कहा-हे तात! यह अनादि सिद्धस्थल है। कालक्रमसे यह लोप हो गया था इसलिये किसीको इसका पता नहीं था॥२॥

तब सेवकन्ह सरस थलु देखा।
कीन्ह सुजल हित कूप बिसेषा॥
बिधि बस भयउ बिस्व उपकारू।
सुगम अगम अति धरम बिचारू॥

तब [भरतजीके] सेवकोंने उस जलयुक्त स्थानको देखा और उस सुन्दर [तीर्थोके] जलके लिये एक खास कुआँ बना लिया। दैवयोगसे विश्वभरका उपकार हो गया। धर्मका विचार जो अत्यन्त अगम था, वह [इस कूपके प्रभावसे] सुगम हो गया ॥३॥

भरतकूप अब कहिहहिं लोगा।
अति पावन तीरथ जल जोगा।
प्रेम सनेम निमज्जत प्रानी।
होइहहिं बिमल करम मन बानी॥

अब इसको लोग भरतकूप कहेंगे। तीर्थोक जलके संयोगसे तो यह अत्यन्त ही पवित्र हो गया। इसमें प्रेमपूर्वक नियमसे स्नान करनेपर प्राणी मन, वचन और कर्मसे निर्मल हो जायेंगे ॥४॥

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