रामायण >> श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (अयोध्याकाण्ड)

श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (अयोध्याकाण्ड)

गोस्वामी तुलसीदास

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2020
पृष्ठ :0
मुखपृष्ठ :
पुस्तक क्रमांक : 10
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भारत की सर्वाधिक प्रचलित रामायण। द्वितीय सोपान अयोध्याकाण्ड

कहत कूप महिमा सकल गए जहाँ रघुराउ।
अत्रि सुनायउ रघुबरहि तीरथ पुन्य प्रभाउ॥३१०॥

कूपकी महिमा कहते हुए सब लोग वहाँ गये जहाँ श्रीरघुनाथजी थे। श्रीरघुनाथजीको अत्रिजीने उस तीर्थका पुण्य प्रभाव सुनाया॥३१०।।

कहत धरम इतिहास सप्रीती।
भयउ भोरु निसि सो सुख बीती॥
नित्य निबाहि भरत दोउ भाई।
राम अत्रि गुर आयसु पाई॥

प्रेमपूर्वक धर्मके इतिहास कहते वह रात सुखसे बीत गयी और सबेरा हो गया। भरत-शत्रुघ्न दोनों भाई नित्यक्रिया पूरी करके, श्रीरामजी, अत्रिजी और गुरु वसिष्ठजीकी आज्ञा पाकर, ॥१॥

सहित समाज साज सब सादें।
चले राम बन अटन पयादें॥
कोमल चरन चलत बिनु पनहीं।
भइ मृदु भूमि सकुचि मन मनहीं।

समाजसहित सब सादे साजसे श्रीरामजीके वनमें भ्रमण (प्रदक्षिणा) करनेके लिये पैदल ही चले। कोमल चरण हैं और बिना जूतेके चल रहे हैं, यह देखकर पृथ्वी मन-ही-मन सकुचाकर कोमल हो गयी॥२॥

कुस कंटक काँकरी कुराई।
कटुक कठोर कुबस्तु दुराईं॥
महि मंजुल मृदु मारग कीन्हे।
बहत समीर त्रिबिध सुख लीन्हे।

कुश, काँटे, कंकड़ी, दरारें आदि कड़वी, कठोर और बुरी वस्तुओंको छिपाकर पृथ्वीने सुन्दर और कोमल मार्ग कर दिये। सुखोंको साथ लिये (सुखदायक) शीतल, मन्द, सुगन्ध हवा चलने लगी ॥३॥

समन बरषि सर घन करि छाहीं।
बिटप फूलि फलि तन मदताहीं॥
मृग बिलोकि खग बोलि सुबानी।
सेवहिं सकल राम प्रिय जानी॥

रास्तेमें देवता फूल बरसाकर, बादल छाया करके, वृक्ष फूल-फलकर, तृण अपनी कोमलतासे, मृग (पशु) देखकर और पक्षी सुन्दर वाणी बोलकर-सभी भरतजीको श्रीरामचन्द्रजी के प्यारे जानकर उनकी सेवा करने लगे॥४॥

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