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रामायण >> श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (अयोध्याकाण्ड) श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (अयोध्याकाण्ड)गोस्वामी तुलसीदास
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भारत की सर्वाधिक प्रचलित रामायण। द्वितीय सोपान अयोध्याकाण्ड
मागेउ बिदा प्रनामु करि राम लिए उर लाइ।
लोग उचाटे अमरपति कुटिल कुअवसरु पाइ॥३१६ ॥
लोग उचाटे अमरपति कुटिल कुअवसरु पाइ॥३१६ ॥
भरतजीने प्रणाम करके विदा माँगी, तब श्रीरामचन्द्रजीने उन्हें हृदयसे लगा लिया।
इधर कुटिल इन्द्रने बुरा मौका पाकर लोगोंका उच्चाटन कर दिया। ३१६॥
सो कुचालि सब कहँ भइ नीकी।
अवधि आस सम जीवनि जी की।
नतरु लखन सिय राम बियोगा।
हहरि मरत सब लोग कुरोगा।
अवधि आस सम जीवनि जी की।
नतरु लखन सिय राम बियोगा।
हहरि मरत सब लोग कुरोगा।
वह कुचाल भी सबके लिये हितकर हो गयी। अवधिकी आशाके समान ही वह जीवनके लिये
संजीवनी हो गयी। नहीं तो (उच्चाटन न होता तो) लक्ष्मणजी, सीताजी और
श्रीरामचन्द्रजीके वियोगरूपी बुरे रोगसे सब लोग घबड़ाकर (हाय-हाय करके) मर ही
जाते॥१॥
रामकृपाँ अवरेब सुधारी।
बिबुध धारि भइ गुनद गोहारी॥
भेटत भुज भरि भाइ भरत सो।
राम प्रेम रसु कहि न परत सो॥
बिबुध धारि भइ गुनद गोहारी॥
भेटत भुज भरि भाइ भरत सो।
राम प्रेम रसु कहि न परत सो॥
श्रीरामजीकी कृपाने सारी उलझन सुधार दी। देवताओंकी सेना जो लूटने आयी थी, वही
गुणदायक (हितकारी) और रक्षक बन गयी। श्रीरामजी भुजाओंमें भरकर भाई भरतसे मिल
रहे हैं। श्रीरामजीके प्रेमका वह रस (आनन्द) कहते नहीं बनता॥२॥
तन मन बचन उमग अनुरागा।
धीर धुरंधर धीरजु त्यागा।
बारिज लोचन मोचत बारी।
देखि दसा सुर सभा दुखारी॥
धीर धुरंधर धीरजु त्यागा।
बारिज लोचन मोचत बारी।
देखि दसा सुर सभा दुखारी॥
तन, मन और वचन तीनोंमें प्रेम उमड़ पड़ा। धीरजकी धुरीको धारण करनेवाले
श्रीरघुनाथजीने भी धीरज त्याग दिया। वे कमलसदृश नेत्रोंसे [प्रेमाश्रुओंका] जल
बहाने लगे। उनकी यह दशा देखकर देवताओंकी सभा (समाज) दु:खी हो गयी॥३॥
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