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रामायण >> श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (अयोध्याकाण्ड) श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (अयोध्याकाण्ड)गोस्वामी तुलसीदास
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भारत की सर्वाधिक प्रचलित रामायण। द्वितीय सोपान अयोध्याकाण्ड
लखनहि भेंटि प्रनामु करि सिर धरि सिय पद धूरि।
चले सप्रेम असीस सुनि सकल सुमंगल मूरि॥३१८॥
चले सप्रेम असीस सुनि सकल सुमंगल मूरि॥३१८॥
फिर लक्ष्मणजीको क्रमश: भेंटकर तथा प्रणाम करके और सीताजीके चरणोंकी धूलिको
सिरपर धारण करके और समस्त मङ्गलोंके मूल आशीर्वाद सुनकर वे प्रेमसहित चले॥३१८॥
सानुज राम नृपहि सिर नाई।
कीन्हि बहुत बिधि बिनय बड़ाई॥
देव दया बस बड़ दुखु पायउ।
सहित समाज काननहिं आयउ॥
कीन्हि बहुत बिधि बिनय बड़ाई॥
देव दया बस बड़ दुखु पायउ।
सहित समाज काननहिं आयउ॥
छोटे भाई लक्ष्मणजीसमेत श्रीरामजीने राजा जनकजीको सिर नवाकर उनकी बहुत प्रकारसे
विनती और बड़ाई की [और कहा-] हे देव! दयावश आपने बहुत दुःख पाया। आप समाजसहित
वनमें आये॥१॥
पुर पगु धारिअ देइ असीसा।
कीन्ह धीर धरि गवनु महीसा॥
मुनि महिदेव साधु सनमाने।
बिदा किए हरि हर सम जाने॥
कीन्ह धीर धरि गवनु महीसा॥
मुनि महिदेव साधु सनमाने।
बिदा किए हरि हर सम जाने॥
अब आशीर्वाद देकर नगरको पधारिये। यह सुन राजा जनकजीने धीरज धरकर गमन किया। फिर
श्रीरामचन्द्रजीने मुनि, ब्राह्मण और साधुओंको विष्णु और शिवके समान जानकर
सम्मान करके उनको विदा किया ॥२॥
सासु समीप गए दोउ भाई।
फिरे बंदि पग आसिष पाई।
कौसिक बामदेव जाबाली।
पुरजन परिजन सचिव सुचाली।
फिरे बंदि पग आसिष पाई।
कौसिक बामदेव जाबाली।
पुरजन परिजन सचिव सुचाली।
तब श्रीराम-लक्ष्मण दोनों भाई सास (सुनयनाजी) के पास गये और उनके चरणोंकी
वन्दना करके आशीर्वाद पाकर लौट आये। फिर विश्वामित्र, वामदेव, जाबालि और शुभ
आचरणवाले कुटुम्बी, नगरनिवासी और मन्त्री- ॥३॥
जथा जोगु करि बिनय प्रनामा।
बिदा किए सब सानुज रामा।
नारि पुरुष लघु मध्य बड़ेरे।
सब सनमानि कृपानिधि फेरे॥
सबको छोटे भाई लक्ष्मणजीसहित श्रीरामचन्द्रजीने यथायोग्य विनय एवं प्रणाम करके
विदा किया। कृपानिधान श्रीरामचन्द्रजीने छोटेमध्यम (मझले) और बड़े सभी श्रेणीके
स्त्री-परुषोंका सम्मान करके उनको लौटाया ॥४॥ बिदा किए सब सानुज रामा।
नारि पुरुष लघु मध्य बड़ेरे।
सब सनमानि कृपानिधि फेरे॥
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