|
रामायण >> श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (अयोध्याकाण्ड) श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (अयोध्याकाण्ड)गोस्वामी तुलसीदास
|
|
||||||
भारत की सर्वाधिक प्रचलित रामायण। द्वितीय सोपान अयोध्याकाण्ड
तेउ बिलोकि रघुबर भरत प्रीति अनूप अपार।
भए मगन मन तन बचन सहित बिराग बिचार॥३१७॥
भए मगन मन तन बचन सहित बिराग बिचार॥३१७॥
वे भी श्रीरामजी और भरतजीके उपमारहित अपार प्रेमको देखकर वैराग्य और विवेकसहित
तन, मन, वचनसे उस प्रेममें मग्न हो गये॥३१७॥
जहाँ जनक गुर गति मति भोरी।
प्राकृत प्रीति कहत बड़ि खोरी॥
बरनत रघुबर भरत बियोगू।
सुनि कठोर कबि जानिहि लोगू॥
प्राकृत प्रीति कहत बड़ि खोरी॥
बरनत रघुबर भरत बियोगू।
सुनि कठोर कबि जानिहि लोगू॥
जहाँ जनकजी और गुरु वसिष्ठजीकी बुद्धिकी गति कुण्ठित हो गयी, उस दिव्य प्रेमको
प्राकृत (लौकिक) कहने में बड़ा दोष है। श्रीरामचन्द्रजी और भरतजीके वियोगका
वर्णन करते सुनकर लोग कविको कठोरहदय समझेंगे॥१॥
सो सकोच रसु अकथ सुबानी।
समउ सनेहु सुमिरि सकुचानी॥
भेटि भरतु रघुबर समुझाए।
पुनि रिपुदवनु हरषि हियँ लाए।
समउ सनेहु सुमिरि सकुचानी॥
भेटि भरतु रघुबर समुझाए।
पुनि रिपुदवनु हरषि हियँ लाए।
वह संकोच-रस अकथनीय है। अतएव कविकी सुन्दर वाणी उस समय उसके प्रेमको स्मरण करके
सकुचा गयी। भरतजीको भेंटकर श्रीरघुनाथजीने उनको समझाया। फिर हर्षित होकर
शत्रुघ्नजीको हृदयसे लगा लिया ॥२॥
सेवक सचिव भरत रुख पाई।
निज निज काज लगे सब जाई॥
सुनि दारुन दुखु दुहूँ समाजा।
लगे चलन के साजन साजा॥
निज निज काज लगे सब जाई॥
सुनि दारुन दुखु दुहूँ समाजा।
लगे चलन के साजन साजा॥
सेवक और मन्त्री भरतजीका रुख पाकर सब अपने-अपने काममें जा लगे। यह सुनकर दोनों
समाजोंमें दारुण दुःख छा गया। वे चलनेकी तैयारियाँ करने लगे॥३॥
प्रभु पद पदुम बंदि दोउ भाई।
चले सीस धरि राम रजाई॥
मुनि तापस बनदेव निहोरी।
सब सनमानि बहोरि बहोरी॥
चले सीस धरि राम रजाई॥
मुनि तापस बनदेव निहोरी।
सब सनमानि बहोरि बहोरी॥
प्रभुके चरणकमलोंकी वन्दना करके तथा श्रीरामजीकी आज्ञाको सिरपर रखकर
भरत-शत्रुघ्न दोनों भाई चले। मुनि, तपस्वी और वनदेवता सबका बार-बार सम्मान करके
उनकी विनती की॥४॥
|
|||||
लोगों की राय
No reviews for this book






