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रामायण >> श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (अयोध्याकाण्ड) श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (अयोध्याकाण्ड)गोस्वामी तुलसीदास
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भारत की सर्वाधिक प्रचलित रामायण। द्वितीय सोपान अयोध्याकाण्ड
दो०- निरखि राम रुख सचिवसुत, कारनु कहेउ बुझाइ।
सुनि प्रसंगु रहि मूक जिमि, दसा बरनि नहिं जाइ॥५४॥
सुनि प्रसंगु रहि मूक जिमि, दसा बरनि नहिं जाइ॥५४॥
तब श्रीरामचन्द्रजीका रुख देखकर मन्त्री के पुत्र ने सब कारण
समझाकर कहा। उस प्रसंगको सुनकर वे गूंगी-जैसी (चुप) रह गयीं, उनकी दशाका
वर्णन नहीं किया जा सकता॥५४॥
राखि न सकइ न कहि सक जाहू।
दुहूँ भाँति उर दारुन दाहू॥
लिखत सुधाकर गा लिखि राहू।
बिधि गति बाम सदा सब काहू॥
दुहूँ भाँति उर दारुन दाहू॥
लिखत सुधाकर गा लिखि राहू।
बिधि गति बाम सदा सब काहू॥
न रख ही सकती हैं, न यह कह सकती हैं कि वन चले जाओ। दोनों ही
प्रकारसे हृदयमें बड़ा भारी सन्ताप हो रहा है। [मनमें सोचती हैं कि देखो-]
विधाता की चाल सदा सबके लिये टेढ़ी होती है। लिखने लगे चन्द्रमा और लिख गया
राहु!॥१॥
धरम सनेह उभयँ मति घेरी।
भइ गति साँप छुछुंदरि केरी॥
राखउँ सुतहि करउँ अनुरोधू।
धरमु जाइ अरु बंधु बिरोधू॥
भइ गति साँप छुछुंदरि केरी॥
राखउँ सुतहि करउँ अनुरोधू।
धरमु जाइ अरु बंधु बिरोधू॥
धर्म और स्नेह दोनोंने कौसल्याजी की बुद्धि को घेर लिया। उनकी
दशा साँप छछूदरकी-सी हो गयी। वे सोचने लगीं कि यदि मैं अनुरोध (हठ) करके
पुत्र को रख लेती हूँ तो धर्म जाता है और भाइयों में विरोध होता है;॥२॥
कहउँ जान बन तौ बड़ि हानी।
संकट सोच बिबस भइ रानी॥
बहुरि समुझि तिय धरमु सयानी।
रामु भरतु दोउ सुत सम जानी॥
संकट सोच बिबस भइ रानी॥
बहुरि समुझि तिय धरमु सयानी।
रामु भरतु दोउ सुत सम जानी॥
और यदि वन जानेको कहती हूँ तो बड़ी हानि होती है। इस प्रकारके
धर्म संकटमें पड़कर रानी विशेषरूपसे सोचके वश हो गयीं। फिर बुद्धिमती
कौसल्याजी स्त्री-धर्म (पातिव्रत-धर्म) को समझकर और राम तथा भरत दोनों
पुत्रोंको समान जानकर-॥३॥
सरल सुभाउ राम महतारी।
बोली बचन धीर धरि भारी॥
तात जाउँ बलि कीन्हेहु नीका।
पितु आयसु सब धरमक टीका।।
बोली बचन धीर धरि भारी॥
तात जाउँ बलि कीन्हेहु नीका।
पितु आयसु सब धरमक टीका।।
सरल स्वभाववाली श्रीरामचन्द्रजीकी माता बड़ा धीरज धरकर वचन
बोलीं-हे तात! मैं बलिहारी जाती हूँ, तुमने अच्छा किया। पिताकी आज्ञाका पालन
करना ही सब धर्मोंका शिरोमणि धर्म है॥४॥
दो०- राजु देन कहि दीन्ह बनु, मोहि न सो दुख लेसु।
तुम्ह बिनु भरतहि भूपतिहि, प्रजहि प्रचंड कलेसु॥५५॥
तुम्ह बिनु भरतहि भूपतिहि, प्रजहि प्रचंड कलेसु॥५५॥
राज्य देनेको कहकर वन दे दिया, उसका मुझे लेशमात्र भी दुःख नहीं
है। [दुःख तो इस बातका है कि] तुम्हारे बिना भरतको, महाराजको और प्रजाको बड़ा
भारी क्लेश होगा।। ५५॥
जौं केवल पितु आयसु ताता।
तौ जनि जाहु जानि बड़ि माता।।
जौं पितु मातु कहेउ बन जाना।
तौ कानन सत अवध समाना।
तौ जनि जाहु जानि बड़ि माता।।
जौं पितु मातु कहेउ बन जाना।
तौ कानन सत अवध समाना।
हे तात! यदि केवल पिताजीकी ही आज्ञा हो, तो माताको [पितासे]
बड़ी जानकर वनको मत जाओ। किन्तु यदि पिता-माता दोनोंने वन जानेको कहा हो, तो
वन तुम्हारे लिये सैकड़ों अयोध्याके समान है॥१॥
पितु बनदेव मातु बनदेवी।
खग मृग चरन सरोरुह सेवी॥
अंतहुँ उचित नृपहि बनबासू।
बय बिलोकि हियँ होइ हराँसू॥
खग मृग चरन सरोरुह सेवी॥
अंतहुँ उचित नृपहि बनबासू।
बय बिलोकि हियँ होइ हराँसू॥
वनके देवता तुम्हारे पिता होंगे और वनदेवियाँ माता होंगी। वहाँ
के पशु-पक्षी तुम्हारे चरण-कमलों के सेवक होंगे। राजाके लिये अन्त में तो
वनवास करना उचित ही है। केवल तुम्हारी [सुकुमार] अवस्था देखकर हृदयमें दुःख
होता है॥२॥
बड़भागी बनु अवध अभागी।
जो रघुबंसतिलक तुम्ह त्यागी॥
जौं सुत कहौं संग मोहि लेहू।
तुम्हरे हृदयँ होइ संदेहू॥
जो रघुबंसतिलक तुम्ह त्यागी॥
जौं सुत कहौं संग मोहि लेहू।
तुम्हरे हृदयँ होइ संदेहू॥
हे रघुवंशके तिलक! वन बड़ा भाग्यवान् है और यह अवध अभागी है,
जिसे तुमने त्याग दिया। हे पुत्र! यदि मैं कहूँ कि मुझे भी साथ ले चलो तो
तुम्हारे हृदयमें सन्देह होगा [कि माता इसी बहाने मुझे रोकना चाहती हैं]॥३॥
पूत परम प्रिय तुम्ह सबही के।
प्रान प्रान के जीवन जी के॥
ते तुम्ह कहहु मातु बन जाऊँ।
मैं सुनि बचन बैठि पछिताऊँ॥
प्रान प्रान के जीवन जी के॥
ते तुम्ह कहहु मातु बन जाऊँ।
मैं सुनि बचन बैठि पछिताऊँ॥
हे पुत्र! तुम सभीके परम प्रिय हो। प्राणोंके प्राण और हृदयके
जीवन हो। वही प्राणाधार) तुम कहते हो कि माता ! मैं वन को जाऊँ और मैं
तुम्हारे वचनों को सुनकर बैठी पछताती हूँ!॥४॥
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