रामायण >> श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (अयोध्याकाण्ड)

श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (अयोध्याकाण्ड)

गोस्वामी तुलसीदास

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2020
पृष्ठ :0
मुखपृष्ठ :
पुस्तक क्रमांक : 10
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भारत की सर्वाधिक प्रचलित रामायण। द्वितीय सोपान अयोध्याकाण्ड

दो०- यह बिचारि नहिं करउँ हठ, झूठ सनेहु बढ़ाइ।
मानि मातु कर नात बलि, सुरति बिसरि जनि जाइ॥५६॥


यह सोचकर झूठा स्नेह बढ़ाकर मैं हठ नहीं करती। बेटा ! मैं बलैया लेती हूँ, माताका नाता मानकर मेरी सुध भूल न जाना॥५६॥


देव पितर सब तुम्हहि गोसाईं।
राखहुँ पलक नयन की नाईं।
अवधि अंबु प्रिय परिजन मीना।
तुम्ह करुनाकर धरम धुरीना॥


हे गोसाईं ! सब देव और पितर तुम्हारी वैसे ही रक्षा करें, जैसे पलकें आँखों की रक्षा करती हैं। तुम्हारे वनवास की अवधि (चौदह वर्ष) जल है, प्रियजन और कुटुम्बी मछली हैं। तुम दया की खान और धर्म की धुरी को धारण करने वाले हो॥१॥

अस बिचारि सोइ करहु उपाई।
सबहि जिअत जेहिं भेंटहु आई॥
जाहु सुखेन बनहि बलि जाऊँ।
करि अनाथ जन परिजन गाऊँ।


ऐसा विचारकर वही उपाय करना जिसमें सबके जीते-जी तुम आ मिलो। मैं बलिहारी जाती हूँ, तुम सेवकों, परिवारवालों और नगरभरको अनाथ करके सुखपूर्वक वनको जाओ॥२॥


सब कर आजु सुकृत फल बीता।
भयउ कराल कालु बिपरीता॥
बहुबिधि बिलपि चरन लपटानी।
परम अभागिनि आपुहि जानी॥


आज सबके पुण्योंका फल पूरा हो गया! कठिन काल हमारे विपरीत हो गया। [इस प्रकार] बहुत विलाप करके और अपने को परम अभागिनी जानकर माता श्रीरामचन्द्रजी के चरणों में लिपट गयीं॥३॥

दारुन दुसह दाहु उर ब्यापा।
बरनि न जाहिं बिलाप कलापा॥
राम उठाइ मातु उर लाई।
कहि मृदु बचन बहुरि समुझाई।


हृदयमें भयानक दुःसह संताप छा गया। उस समय के बहुविध विलापका वर्णन नहीं किया जा सकता। श्रीरामचन्द्रजीने माताको उठाकर हृदयसे लगा लिया और फिर कोमल वचन कहकर उन्हें समझाया।॥४॥

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