रामायण >> श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (अयोध्याकाण्ड)

श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (अयोध्याकाण्ड)

गोस्वामी तुलसीदास

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2020
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पुस्तक क्रमांक : 10
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भारत की सर्वाधिक प्रचलित रामायण। द्वितीय सोपान अयोध्याकाण्ड


दो०- ऐसेउ बचन कठोर सुनि, जौं न हृदउ बिलगान।
तौ प्रभु बिषम बियोग दुख, सहिहहिं पावर प्रान॥६७॥


ऐसे कठोर वचन सुनकर भी जब मेरा हृदय न फटा तो, हे प्रभु! [मालूम होता है] ये पामर प्राण आपके वियोगका भीषण दुःख सहेंगे॥६७॥

अस कहि सीय बिकल भइ भारी।
बचन बियोगु न सकी सँभारी॥
देखि दसा रघुपति जियँ जाना।
हठि राखें नहिं राखिहि प्राना।


ऐसा कहकर सीताजी बहुत ही व्याकुल हो गयीं। वे वचनके वियोगको भी न सँभाल सकीं। (अर्थात् शरीरसे वियोगकी बात तो अलग रही, वचनसे भी वियोगकी बात सुनकर वे अत्यन्त विकल हो गयीं) उनकी यह दशा देखकर श्रीरघुनाथजीने अपने जीमें जान लिया कि हठपूर्वक इन्हें यहाँ रखनेसे ये प्राणोंको न रखेंगी॥१॥

कहेउ कृपाल भानुकुलनाथा।
परिहरि सोचु चलहु बन साथा॥
नहिं बिषाद कर अवसरु आजू।
बेगि करहु बन गवन समाजू॥


तब कृपालु, सूर्यकुलके स्वामी श्रीरामचन्द्रजीने कहा कि सोच छोड़कर मेरे साथ वनको चलो। आज विषाद करनेका अवसर नहीं है। तुरंत वनगमनकी तैयारी करो॥२॥

कहि प्रिय बचन प्रिया समुझाई।
लगे मातु पद आसिष पाई॥
बेगि प्रजा दुख मेटब आई।
जननी निठुर बिसरि जनि जाई॥


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