रामायण >> श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (अयोध्याकाण्ड)

श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (अयोध्याकाण्ड)

गोस्वामी तुलसीदास

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2020
पृष्ठ :0
मुखपृष्ठ :
पुस्तक क्रमांक : 10
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भारत की सर्वाधिक प्रचलित रामायण। द्वितीय सोपान अयोध्याकाण्ड

 

दो०- राखिअ अवध जो अवधि लगि, रहत न जनिअहिं प्रान।
दीनबंधु सुंदर सुखद, सील सनेह निधान॥६६॥


हे दीनबन्धु! हे सुन्दर ! हे सुख देनेवाले! हे शील और प्रेमके भण्डार! यदि अवधि (चौदह वर्ष) तक मुझे अयोध्यामें रखते हैं तो जान लीजिये कि मेरे प्राण नहीं रहेंगे॥६६॥

मोहि मग चलत न होइहि हारी।
छिनु छिनु चरन सरोज निहारी॥
सबहि भाँति पिय सेवा करिहौं।
मारग जनित सकल श्रम हरिहौं।


क्षण-क्षणमें आपके चरणकमलों को देखते रहने से मुझे मार्ग चलने में थकावट न होगी। हे प्रियतम ! मैं सभी प्रकारसे आपकी सेवा करूँगी और मार्ग चलने से होने वाली सारी थकावट को दूर कर दूंगी॥१॥

पाय पखारि बैठि तरु छाहीं।
करिहउँ बाउ मुदित मन माहीं॥
श्रम कन सहित स्याम तनु देखें।
कहँ दुख समउ प्रानपति पेखें।


आपके पैर धोकर, पेड़ों की छाया में बैठकर, मन में प्रसन्न होकर हवा करूँगी (पंखा झलूँगी)। पसीने की बूंदों सहित श्याम शरीर को देखकर-प्राणपति के दर्शन करते हुए दुःखके लिये मुझे अवकाश ही कहाँ रहेगा॥२॥

सम महि तृन तरुपल्लव डासी।
पाय पलोटिहि सब निसि दासी।।
बार बार मृदु मूरति जोही।
लागिहि तात बयारि न मोही।


समतल भूमि पर घास और पेड़ों के पत्ते बिछाकर यह दासी रातभर आपके चरण दबावेगी। बार-बार आपकी कोमल मूर्तिको देखकर मुझको गरम हवा भी न लगेगी॥३॥

को प्रभु सँग मोहि चितवनिहारा।
सिंघबधुहि जिमि ससक सिआरा॥
मैं सुकुमारि नाथ बन जोगू।
तुम्हहि उचित तप मो कहुँ भोगू॥


प्रभुके साथ [रहते] मेरी ओर [आँख उठाकर] देखनेवाला कौन है (अर्थात् कोई नहीं देख सकता)! जैसे सिंहकी स्त्री (सिंहनी) को खरगोश और सियार नहीं देख सकते। मैं सुकुमारी हूँ और नाथ वनके योग्य हैं? आपको तो तपस्या उचित है और मुझको विषय-भोग?॥४॥

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