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रामायण >> श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (अयोध्याकाण्ड) श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (अयोध्याकाण्ड)गोस्वामी तुलसीदास
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भारत की सर्वाधिक प्रचलित रामायण। द्वितीय सोपान अयोध्याकाण्ड
दो०- समुझि सुमित्राँ राम सिय, रूपु सुसीलु सुभाउ।
नृप सनेहु लखि धुनेउ सिरु, पापिनि दीन्ह कुदाउ॥७३॥
नृप सनेहु लखि धुनेउ सिरु, पापिनि दीन्ह कुदाउ॥७३॥
धीरजु धरेउ कुअवसर जानी।
सहज सुहृद बोली मृदु बानी॥
तात तुम्हारि मातु बैदेही।
पिता रामु सब भाँति सनेही॥
सहज सुहृद बोली मृदु बानी॥
तात तुम्हारि मातु बैदेही।
पिता रामु सब भाँति सनेही॥
अवध तहाँ जहँ राम निवासू।
तहँइँ दिवसु जहँ भानु प्रकासू॥
जौं पै सीय रामु बन जाहीं।
अवध तुम्हार काजु कछु नाहीं॥
तहँइँ दिवसु जहँ भानु प्रकासू॥
जौं पै सीय रामु बन जाहीं।
अवध तुम्हार काजु कछु नाहीं॥
गुर पितु मातु बंधु सुर साईं।
सेइअहिं सकल प्रान की नाईं।
रामु प्रानप्रिय जीवन जी के।
स्वारथ रहित सखा सबही के॥
सेइअहिं सकल प्रान की नाईं।
रामु प्रानप्रिय जीवन जी के।
स्वारथ रहित सखा सबही के॥






