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श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (अयोध्याकाण्ड)
श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (अयोध्याकाण्ड)
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भारत की सर्वाधिक प्रचलित रामायण। द्वितीय सोपान अयोध्याकाण्ड
दो०- भूरि भाग भाजनु भयहु, मोहि समेत बलि जाउँ।
जौं तुम्हरें मन छाड़ि छलु, कीन्ह राम पद ठाउँ॥७४॥
मैं बलिहारी जाती हूँ, [हे पुत्र!] मेरे समेत तुम बड़े ही सौभाग्य के
पात्र हुए, जो तुम्हारे चित्त ने छल छोड़कर श्रीरामजी के चरणों में स्थान
प्राप्त किया है॥७४॥
पुत्रवती जुबती जग सोई।
रघुपति भगतु जासु सुतु होई॥
नतरु बाँझ भलि बादि बिआनी।
राम बिमुख सुत तें हित जानी।
संसार में वही युवती स्त्री पुत्रवती है जिसका पुत्र श्रीरघुनाथजी का
भक्त हो। नहीं तो जो राम से विमुख पुत्र से अपना हित जानती है, वह तो बाँझ ही
अच्छी। पशु की भाँति उसका ब्याना (पुत्र प्रसव करना) व्यर्थ ही है॥१॥
तुम्हरेहिं भाग रामु बन जाहीं।
दूसर हेतु तात कछु नाहीं॥
सकल सुकृत कर बड़ फलु एहू।
राम सीय पद सहज सनेहू॥
तुम्हारे ही भाग्यसे श्रीरामजी वनको जा रहे हैं। हे तात! दूसरा कोई
कारण नहीं है। सम्पूर्ण पुण्योंका सबसे बड़ा फल यही है कि श्रीसीतारामजीके
चरणोंमें स्वाभाविक प्रेम हो॥२॥
रागु रोषु इरिषा मदु मोहू।
जनि सपनेहुँ इन्ह के बस होहू॥
सकल प्रकार बिकार बिहाई।
मन क्रम बचन करेहु सेवकाई॥
राग, रोष, ईर्ष्या, मद और मोह– इनके वश स्वप्न में भी मत होना। सब
प्रकार के विकारों का त्याग कर मन, वचन और कर्मसे श्रीसीतारामजी की सेवा
करना॥३॥
तुम्ह कहुँ बन सब भाँति सुपासू।
सँग पितु मातु रामु सिय जासू॥
जेहिं न रामु बन लहहिं कलेसू।
सुत सोइ करेहु इहइ उपदेसू॥
तुमको वनमें सब प्रकारसे आराम है, जिसके साथ श्रीरामजी और सीताजीरूप
पिता-माता हैं। हे पुत्र! तुम वही करना जिससे श्रीरामचन्द्रजी वनमें क्लेश न
पावें, मेरा यही उपदेश है॥४॥
छं०- उपदेसु यहु जेहिं तात तुम्हरे राम सिय सुख पावहीं।
पितु मातु प्रिय परिवार पुर सुख सुरति बन बिसरावहीं॥
तुलसी प्रभुहि सिख देइ आयसु दीन्ह पुनि आसिष दई।
रति होउ अबिरल अमल सिय रघुबीर पद नित नित नई॥
हे तात! मेरा यही उपदेश है (अर्थात् तुम वही करना) जिससे वन में
तुम्हारे कारण श्रीरामजी और सीताजी सुख पावें और पिता, माता, प्रिय परिवार
तथा नगरके सुखों की याद भूल जायँ। तुलसीदासजी कहते हैं कि सुमित्राजी ने इस
प्रकार हमारे प्रभु (श्रीलक्ष्मणजी) को शिक्षा देकर [वन जानेकी] आज्ञा दी और
फिर यह आशीर्वाद दिया कि श्रीसीताजी और श्रीरघुवीरजी के चरणों में तुम्हारा
निर्मल (निष्काम और अनन्य) एवं प्रगाढ़ प्रेम नित-नित नया हो!
सो०- मातु चरन सिरु नाइ चले तुरत संकित हृदयँ।
बागुर बिषम तोराइ मनहुँ भाग मृगु भाग बस॥७५॥
माता के चरणों में सिर नवाकर हृदयमें डरते हुए [कि अब भी कोई विघ्न न आ
जाय] लक्ष्मणजी तुरंत इस तरह चल दिये जैसे सौभाग्यवश कोई हिरन कठिन फंदे को
तुड़ाकर भाग निकला हो॥७५॥