रामायण >> श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (अयोध्याकाण्ड)

श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (अयोध्याकाण्ड)

गोस्वामी तुलसीदास

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2020
पृष्ठ :0
मुखपृष्ठ :
पुस्तक क्रमांक : 10
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भारत की सर्वाधिक प्रचलित रामायण। द्वितीय सोपान अयोध्याकाण्ड


दो०-सीय सहित सुत सुभग दोउ, देखि देखि अकुलाइ।
बारहिं बार सनेह बस, राउ लेइ उर लाइ॥७६॥

सीतासहित दोनों सुन्दर पुत्रों को देख-देखकर राजा अकुलाते हैं और स्नेहवश बारंबार उन्हें हृदय से लगा लेते हैं॥७६॥

सकइ न बोलि बिकल नरनाहू।
सोक जनित उर दारुन दाहू।।
नाइ सीसु पद अति अनुरागा।
उठि रघुबीर बिदा तब मागा॥


राजा व्याकुल हैं, बोल नहीं सकते। हृदयमें शोकसे उत्पन्न हुआ भयानक सन्ताप है। तब रघुकुलके वीर श्रीरामचन्द्रजी ने अत्यन्त प्रेम से चरणों में सिर नवाकर उठकर विदा माँगी-॥१॥

पितु असीस आयसु मोहि दीजै।
हरष समय बिसमउ कत कीजै॥
तात किएँ प्रिय प्रेम प्रमादू।
जसु जग जाइ होइ अपबादू॥


हे पिताजी ! मुझे आशीर्वाद और आज्ञा दीजिये। हर्षके समय आप शोक क्यों कर रहे हैं ? हे तात! प्रियके प्रेमवश प्रमाद (कर्तव्यकर्ममें त्रुटि) करनेसे जगत् में यश जाता रहेगा और निन्दा होगी।। २॥

सुनि सनेह बस उठि नरनाहाँ।
बैठारे रघुपति गहि बाहाँ॥
सुनहु तात तुम्ह कहुँ मुनि कहहीं।
रामु चराचर नायक अहहीं॥

यह सुनकर स्नेहवश राजाने उठकर श्रीरघुनाथजीकी बाँह पकड़कर उन्हें बैठा लिया और कहा-हे तात! सुनो, तुम्हारे लिये मुनिलोग कहते हैं कि श्रीराम चराचर के स्वामी हैं॥३॥

सुभ अरु असुभ करम अनुहारी।
ईसु देइ फलु हृदय बिचारी॥
करइ जो करम पाव फल सोई।
निगम नीति असि कह सबु कोई॥

शुभ और अशुभ कर्मों के अनुसार ईश्वर हृदय में विचारकर फल देता है। जो कर्म करता है वही फल पाता है। ऐसी वेद की नीति है, यह सब कोई कहते हैं॥ ४॥

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