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रामायण >> श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (अयोध्याकाण्ड) श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (अयोध्याकाण्ड)गोस्वामी तुलसीदास
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भारत की सर्वाधिक प्रचलित रामायण। द्वितीय सोपान अयोध्याकाण्ड
दो०- औरु करै अपराधु कोउ, और पाव फल भोगु।
अति बिचित्र भगवंत गति, को जग जानै जोगु॥७७॥
अति बिचित्र भगवंत गति, को जग जानै जोगु॥७७॥
रायँ राम राखन हित लागी।
बहुत उपाय किए छलु त्यागी॥
लखी राम रुख रहत न जाने।
धरम धुरंधर धीर सयाने॥
बहुत उपाय किए छलु त्यागी॥
लखी राम रुख रहत न जाने।
धरम धुरंधर धीर सयाने॥
तब नृप सीय लाइ उर लीन्ही।
अति हित बहुत भाँति सिख दीन्ही।
कहि बन के दुख दुसह सुनाए।
सासु ससुर पितु सुख समुझाए।
अति हित बहुत भाँति सिख दीन्ही।
कहि बन के दुख दुसह सुनाए।
सासु ससुर पितु सुख समुझाए।
सिय मनु राम चरन अनुरागा।
घरु न सुगमु बनु बिषमु न लागा॥
औरउ सबहिं सीय समुझाई।
कहि कहि बिपिन बिपति अधिकाई॥
घरु न सुगमु बनु बिषमु न लागा॥
औरउ सबहिं सीय समुझाई।
कहि कहि बिपिन बिपति अधिकाई॥






