|
रामायण >> श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (अयोध्याकाण्ड) श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (अयोध्याकाण्ड)गोस्वामी तुलसीदास
|
|
||||||
भारत की सर्वाधिक प्रचलित रामायण। द्वितीय सोपान अयोध्याकाण्ड
दो०- सुद्ध सच्चिदानंदमय, कंद भानुकुल केतु।
चरित करत नर अनुहरत, संसृति सागर सेतु॥८७॥
चरित करत नर अनुहरत, संसृति सागर सेतु॥८७॥
यह सुधि गुहँ निषाद जब पाई।
मुदित लिए प्रिय बंधु बोलाई॥
लिए फल मूल भेंट भरि भारा।
मिलन चलेउ हियँ हरषु अपारा॥
मुदित लिए प्रिय बंधु बोलाई॥
लिए फल मूल भेंट भरि भारा।
मिलन चलेउ हियँ हरषु अपारा॥
करि दंडवत भेंट धरि आगें।
प्रभुहि बिलोकत अति अनुरागें।
सहज सनेह बिबस रघुराई।
पूँछी कुसल निकट बैठाई॥
प्रभुहि बिलोकत अति अनुरागें।
सहज सनेह बिबस रघुराई।
पूँछी कुसल निकट बैठाई॥
नाथ कुसल पद पंकज देखें।
भयउँ भागभाजन जन लेखें॥
देव धरनि धनु धामु तुम्हारा।
मैं जनु नीचु सहित परिवारा॥
भयउँ भागभाजन जन लेखें॥
देव धरनि धनु धामु तुम्हारा।
मैं जनु नीचु सहित परिवारा॥






