रामायण >> श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (अयोध्याकाण्ड)

श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (अयोध्याकाण्ड)

गोस्वामी तुलसीदास

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2020
पृष्ठ :0
मुखपृष्ठ :
पुस्तक क्रमांक : 10
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भारत की सर्वाधिक प्रचलित रामायण। द्वितीय सोपान अयोध्याकाण्ड


दो०- बरष चारिदस बासु बन, मुनि ब्रत बेषु अहारु।
ग्राम बासु नहिं उचित सुनि, गुहहि भयउ दुखु भारु॥८८॥


[उनके आज्ञानुसार] मुझे चौदह वर्ष तक मुनियों का व्रत और वेष धारणकर और मुनियोंके योग्य आहार करते हुए वनमें ही बसना है, गाँव के भीतर निवास करना उचित नहीं है। यह सुनकर गुहको बड़ा दुःख हुआ॥८८॥

राम लखन सिय रूप निहारी।
कहहिं सप्रेम ग्राम नर नारी॥
ते पितु मातु कहहु सखि कैसे।
जिन्ह पठए बन बालक ऐसे॥


श्रीरामजी, लक्ष्मणजी और सीताजीके रूपको देखकर गाँवके स्त्री-पुरुष प्रेमके साथ चर्चा करते हैं। [कोई कहती है-] हे सखी! कहो तो, वे माता-पिता कैसे हैं, जिन्होंने ऐसे [सुन्दर सुकुमार] बालकोंको वनमें भेज दिया है!॥ १॥

एक कहहिं भल भूपति कीन्हा।
लोयन लाहु हमहि बिधि दीन्हा॥
तब निषादपति उर अनुमाना।
तरु सिंसुपा मनोहर जाना।


कोई एक कहते हैं-राजाने अच्छा ही किया, इसी बहाने हमें भी ब्रह्मा ने नेत्रों का लाभ दिया। तब निषादराज ने हृदय में अनुमान किया, तो अशोक के पेड़ को [उनके ठहरने के लिये] मनोहर समझा॥२॥

लै रघुनाथहि ठाउँ देखावा।
कहेउ राम सब भाँति सुहावा॥
पुरजन करि जोहारु घर आए।
रघुबर संध्या करन सिधाए॥


उसने श्रीरघुनाथजी को ले जाकर वह स्थान दिखाया। श्रीरामचन्द्रजी ने [देखकर] कहा कि यह सब प्रकार से सुन्दर है। पुरवासी लोग जोहार (वन्दना) करके अपने अपने घर लौटे और श्रीरामचन्द्रजी सन्ध्या करने पधारे॥३॥

गुहँ सँवारि साँथरी डसाई।
कुस किसलयमय मृदुल सुहाई॥
सुचि फल मूल मधुर मृदु जानी।
दोना भरि भरि राखेसि पानी॥

गुहने [इसी बीच] कुश और कोमल पत्तोंकी कोमल और सुन्दर साथरी सजाकर बिछा दी; और पवित्र, मीठे और कोमल देख-देखकर दोनों में भर-भरकर फल-मूल और पानी रख दिया [अथवा अपने हाथसे फल-मूल दोनों में भर-भरकर रख दिये]॥४॥

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