|
रामायण >> श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (अयोध्याकाण्ड) श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (अयोध्याकाण्ड)गोस्वामी तुलसीदास
|
|
||||||
भारत की सर्वाधिक प्रचलित रामायण। द्वितीय सोपान अयोध्याकाण्ड
दो०- बरष चारिदस बासु बन, मुनि ब्रत बेषु अहारु।
ग्राम बासु नहिं उचित सुनि, गुहहि भयउ दुखु भारु॥८८॥
ग्राम बासु नहिं उचित सुनि, गुहहि भयउ दुखु भारु॥८८॥
राम लखन सिय रूप निहारी।
कहहिं सप्रेम ग्राम नर नारी॥
ते पितु मातु कहहु सखि कैसे।
जिन्ह पठए बन बालक ऐसे॥
कहहिं सप्रेम ग्राम नर नारी॥
ते पितु मातु कहहु सखि कैसे।
जिन्ह पठए बन बालक ऐसे॥
एक कहहिं भल भूपति कीन्हा।
लोयन लाहु हमहि बिधि दीन्हा॥
तब निषादपति उर अनुमाना।
तरु सिंसुपा मनोहर जाना।
लोयन लाहु हमहि बिधि दीन्हा॥
तब निषादपति उर अनुमाना।
तरु सिंसुपा मनोहर जाना।
लै रघुनाथहि ठाउँ देखावा।
कहेउ राम सब भाँति सुहावा॥
पुरजन करि जोहारु घर आए।
रघुबर संध्या करन सिधाए॥
कहेउ राम सब भाँति सुहावा॥
पुरजन करि जोहारु घर आए।
रघुबर संध्या करन सिधाए॥






