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रामायण >> श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (अयोध्याकाण्ड) श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (अयोध्याकाण्ड)गोस्वामी तुलसीदास
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भारत की सर्वाधिक प्रचलित रामायण। द्वितीय सोपान अयोध्याकाण्ड
दो०- कैकयनंदिनि मंदमति, कठिन कुटिलपनु कीन्ह।
जेहिं रघुनंदन जानकिहि, सुख अवसर दुखु दीन्ह॥९१॥
जेहिं रघुनंदन जानकिहि, सुख अवसर दुखु दीन्ह॥९१॥
भइ दिनकर कुल बिटप कुठारी।
कुमति कीन्ह सब बिस्व दुखारी॥
भयउ बिषादु निषादहि भारी।
राम सीय महि सयन निहारी॥
कुमति कीन्ह सब बिस्व दुखारी॥
भयउ बिषादु निषादहि भारी।
राम सीय महि सयन निहारी॥
बोले लखन मधुर मृदु बानी।
ग्यान बिराग भगति रस सानी।
काहु न कोउ सुख दुख कर दाता।
निज कृत करम भोग सबु भ्राता॥
ग्यान बिराग भगति रस सानी।
काहु न कोउ सुख दुख कर दाता।
निज कृत करम भोग सबु भ्राता॥
जोग बियोग भोग भल मंदा।
हित अनहित मध्यम भ्रम फंदा॥
जनमु मरनु जहँ लगि जग जालू।
संपति बिपति करमु अरु कालू॥
हित अनहित मध्यम भ्रम फंदा॥
जनमु मरनु जहँ लगि जग जालू।
संपति बिपति करमु अरु कालू॥






