रामायण >> श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (अयोध्याकाण्ड)

श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (अयोध्याकाण्ड)

गोस्वामी तुलसीदास

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2020
पृष्ठ :0
मुखपृष्ठ :
पुस्तक क्रमांक : 10
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भारत की सर्वाधिक प्रचलित रामायण। द्वितीय सोपान अयोध्याकाण्ड


दो०- कैकयनंदिनि मंदमति, कठिन कुटिलपनु कीन्ह।
जेहिं रघुनंदन जानकिहि, सुख अवसर दुखु दीन्ह॥९१॥


कैकयराज की लड़की नीचबुद्धि कैकेयी ने बड़ी ही कुटिलता की, जिसने रघुनन्दन श्रीरामजीको और जानकीजीको सुखके समय दुःख दिया॥९१॥


भइ दिनकर कुल बिटप कुठारी।
कुमति कीन्ह सब बिस्व दुखारी॥
भयउ बिषादु निषादहि भारी।
राम सीय महि सयन निहारी॥


वह सूर्यकुलरूपी वृक्ष के लिये कुल्हाड़ी हो गयी। उस कुबुद्धिने सम्पूर्ण विश्व को दुःखी कर दिया। श्रीराम-सीता को जमीनपर सोते हुए देखकर निषाद को बड़ा दुःख हुआ॥१॥


बोले लखन मधुर मृदु बानी।
ग्यान बिराग भगति रस सानी।
काहु न कोउ सुख दुख कर दाता।
निज कृत करम भोग सबु भ्राता॥


तब लक्ष्मणजी ज्ञान, वैराग्य और भक्ति के रस से सनी हुई मीठी और कोमल वाणी बोले-हे भाई! कोई किसीको सुख-दुःख का देनेवाला नहीं है। सब अपने ही किये हुए कर्मों का फल भोगते हैं॥२॥


जोग बियोग भोग भल मंदा।
हित अनहित मध्यम भ्रम फंदा॥
जनमु मरनु जहँ लगि जग जालू।
संपति बिपति करमु अरु कालू॥


संयोग (मिलना), वियोग (बिछुड़ना), भले-बुरे भोग, शत्रु, मित्र और उदासीन-ये सभी भ्रमके फंदे हैं। जन्म-मृत्यु, सम्पत्ति-विपत्ति, कर्म और काल जहाँतक जगत्के जंजाल हैं;॥३॥


धरनि धामु धनु पुर परिवारू।
सरगु नरकु जहँ लगि ब्यवहारू॥
देखिअ सुनिअ गुनिअ मन माहीं।
मोह मूल परमारथु नाहीं॥


धरती, घर,धन, नगर, परिवार, स्वर्ग और नरक आदि जहाँतक व्यवहार हैं जो देखने, सुनने और मनके अंदर विचारनेमें आते हैं, इन सबका मूल मोह (अज्ञान) ही है। परमार्थतः ये नहीं हैं॥४॥

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