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रामायण >> श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (अयोध्याकाण्ड) श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (अयोध्याकाण्ड)गोस्वामी तुलसीदास
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भारत की सर्वाधिक प्रचलित रामायण। द्वितीय सोपान अयोध्याकाण्ड
सो०- सुनि केवट के बैन प्रेम लपेटे अटपटे।
बिहसे करुनाऐन चितइ जानकी लखन तन॥१००॥
बिहसे करुनाऐन चितइ जानकी लखन तन॥१००॥
केवटके प्रेम में लपेटे हुए अटपटे वचन सुनकर करुणाधाम श्रीरामचन्द्रजी जानकीजी और लक्ष्मणजी की ओर देखकर हँसे॥१००॥
कृपासिंधु बोले मुसुकाई।
सोइ करु जेहिं तव नाव न जाई॥
बेगि आनु जल पाय पखारू।
होत बिलंबु उतारहि पारू॥
सोइ करु जेहिं तव नाव न जाई॥
बेगि आनु जल पाय पखारू।
होत बिलंबु उतारहि पारू॥
कृपा के समुद्र श्रीरामचन्द्रजी केवट से मुसकराकर बोले-भाई! तू वही कर जिससे तेरी नाव न जाय। जल्दी पानी ला और पैर धो ले। देर हो रही है, पार उतार दे॥१॥
जासु नाम सुमिरत एक बारा।
उतरहिं नर भवसिंधु अपारा॥
सोइ कृपालु केवटहि निहोरा।
जेहिं जगु किय तिहु पगहु ते थोरा॥
उतरहिं नर भवसिंधु अपारा॥
सोइ कृपालु केवटहि निहोरा।
जेहिं जगु किय तिहु पगहु ते थोरा॥
एक बार जिनका नाम स्मरण करते ही मनुष्य अपार भवसागर के पार उतर जाते हैं, और जिन्होंने [वामनावतारमें] जगत् को तीन पग से भी छोटा कर दिया था (दो ही पगमें त्रिलोकी को नाप लिया था), वही कृपालु श्रीरामचन्द्रजी [गङ्गाजी से पार उतारने के लिये] केवट का निहोरा कर रहे हैं !॥२॥
पद नख निरखि देवसरि हरषी।
सुनि प्रभु बचन मोहँ मति करषी॥
केवट राम रजायसु पावा।
पानि कठवता भरि लेइ आवा॥
सुनि प्रभु बचन मोहँ मति करषी॥
केवट राम रजायसु पावा।
पानि कठवता भरि लेइ आवा॥
प्रभुके इन वचनों को सुनकर गङ्गाजी की बुद्धि मोह से खिंच गयी थी [कि ये साक्षात् भगवान् होकर भी पार उतारने के लिये केवट का निहोरा कैसे कर रहे हैं]। परन्तु [समीप आने पर अपनी उत्पत्ति के स्थान] पदनखों को देखते ही [उन्हें पहचानकर] देवनदी गङ्गाजी हर्षित हो गयीं। (वे समझ गयीं कि भगवान् नरलीला कर रहे हैं, इससे उनका मोह नष्ट हो गया; और इन चरणों का स्पर्श प्राप्त करके मैं धन्य होऊँगी, यह विचारकर वे हर्षित हो गयीं।) केवट श्रीरामचन्द्रजी की आज्ञा पाकर कठौते में भरकर जल ले आया॥३॥
अति आनंद उमगि अनुरागा।
चरन सरोज पखारन लागा।
बरषि सुमन सुर सकल सिहाहीं।
एहि सम पुन्यपुंज कोउ नाहीं॥
चरन सरोज पखारन लागा।
बरषि सुमन सुर सकल सिहाहीं।
एहि सम पुन्यपुंज कोउ नाहीं॥
अत्यन्त आनन्द और प्रेम में उमँगकर वह भगवान् के चरणकमल धोने लगा। सब देवता फूल बरसाकर सिहाने लगे कि इसके समान पुण्य की राशि कोई नहीं है॥४॥
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