रामायण >> श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (अयोध्याकाण्ड)

श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (अयोध्याकाण्ड)

गोस्वामी तुलसीदास

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2020
पृष्ठ :0
मुखपृष्ठ :
पुस्तक क्रमांक : 10
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भारत की सर्वाधिक प्रचलित रामायण। द्वितीय सोपान अयोध्याकाण्ड

दो०- पद पखारि जलु पान करि आपु सहित परिवार।
पितर पारु करि प्रभुहि पुनि मुदित गयउ लेइ पार॥१०१॥
 
चरणों को धोकर और सारे परिवारसहित स्वयं उस जल (चरणोदक) को पीकर पहले [उस महान् पुण्य के द्वारा अपने पितरोंको भवसागर से पारकर फिर आनन्दपूर्वक प्रभु श्रीरामचन्द्र को गङ्गाजीके पार ले गया॥१०१॥

उतरि ठाढ़ भए सुरसरि रेता।
सीय रामु गुह लखन समेता।
केवट उतरि दंडवत कीन्हा।
प्रभुहि सकुच एहि नहिं कछु दीन्हा॥

निषादराज और लक्ष्मणजीसहित श्रीसीताजी और श्रीरामचन्द्रजी [नावसे] उतरकर गङ्गाजी की रेत (बालू) में खड़े हो गये। तब केवट ने उतरकर दण्डवत् की। [उसको दण्डवत् करते देखकर] प्रभुको संकोच हुआ कि इसको कुछ दिया नहीं॥१॥

पिय हिय की सिय जाननिहारी। मनि मुदरी मन मुदित उतारी।
कहेउ कृपाल लेहि उतराई। केवट चरन गहे अकुलाई।

पति के हृदय की जाननेवाली सीताजी ने आनन्द भरे मनसे अपनी रत्नजटित अंगूठी [अंगुलीसे] उतारी। कृपालु श्रीरामचन्द्रजी ने केवट से कहा, नाव की उतराई लो। केवटने व्याकुल होकर चरण पकड़ लिये॥२॥

नाथ आजु मैं काह न पावा।
मिटे दोष दुख दारिद दावा॥
बहुत काल मैं कोन्हि मजूरी।
आजु दीन्ह बिधि बनि भलि भूरी॥

[उसने कहा-] हे नाथ! आज मैंने क्या नहीं पाया! मेरे दोष, दुःख और दरिद्रताकी आग आज बुझ गयी है। मैंने बहुत समय तक मजदूरी की। विधाता ने आज बहुत अच्छी भरपूर मजदूरी दे दी।३।।

अब कछु नाथ न चाहिअ मोरें।
दीनदयाल अनुग्रह तोरें॥
फिरती बार मोहि जो देबा।
सो प्रसादु मैं सिर धरि लेबा॥


हे नाथ! हे दीनदयाल! आपकी कृपासे अब मुझे कुछ नहीं चाहिये। लौटती बार आप मुझे जो कुछ देंगे, वह प्रसाद मैं सिर चढ़ाकर लूँगा॥ ४॥

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