रामायण >> श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (अयोध्याकाण्ड)

श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (अयोध्याकाण्ड)

गोस्वामी तुलसीदास

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2020
पृष्ठ :0
मुखपृष्ठ :
पुस्तक क्रमांक : 10
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भारत की सर्वाधिक प्रचलित रामायण। द्वितीय सोपान अयोध्याकाण्ड

दो०- सेवहिं सुकृती साधु सुचि पावहिं सब मनकाम।
बंदी बेद पुरान गन कहहिं बिमल गुन ग्राम॥१०५॥

पुण्यात्मा, पवित्र साधु उसकी सेवा करते हैं और सब मनोरथ पाते हैं। वेद और पुराणों के समूह भाट हैं, जो उसके निर्मल गुण गणों का बखान करते हैं॥१०५।।
 
को कहि सकइ प्रयाग प्रभाऊ।
कलुष पुंज कुंजर मृगराऊ॥
अस तीरथपति देखि सुहावा।
सुख सागर रघुबर सुखु पावा।

पापों के समूह रूपी हाथी को मारने के लिये सिंह रूप प्रयागराज का प्रभाव (महत्त्व माहात्म्य) कौन कह सकता है। ऐसे सुहावने तीर्थराज का दर्शन कर सुख के समुद्र रघुकुल श्रेष्ठ श्रीराम जीने भी सुख पाया॥१॥

कहि सिय लखनहि सखहि सुनाई।
श्रीमुख तीरथराज बड़ाई।
करि प्रनामु देखत बन बागा।
कहत महातम अति अनुरागा॥

उन्होंने अपने श्रीमुख से सीताजी, लक्ष्मणजी और सखा गुह को तीर्थराज की महिमा कहकर सुनायी। तदनन्तर प्रणाम करके, वन और बच्चों को देखते हुए और बड़े प्रेम से माहात्म्य कहते हुए---॥२॥

एहि बिधि आइ बिलोकी बेनी।
सुमिरत सकल सुमंगल देनी॥
मुदित नहाइ कीन्हि सिव सेवा।
पूजि जथाबिधि तीरथ देवा।


इस प्रकार श्रीराम ने आकर त्रिवेणी का दर्शन किया, जो स्मरण करने से ही सब सुन्दर मङ्गलों को देने वाली है। फिर आनन्दपूर्वक [त्रिवेणी में] स्नान करके शिवजी की सेवा (पूजा) की और विधिपूर्वक तीर्थ देवताओं का पूजन किया॥३॥

तब प्रभु भरद्वाज पहिं आए।
करत दंडवत मुनि उर लाए।
मुनि मन मोद न कछु कहि जाई।
ब्रह्मानंद रासि जनु पाई॥

[स्नान, पूजन आदि सब करके] तब प्रभु श्रीरामजी भरद्वाजजी के पास आये। उन्हें दण्डवत् करते हुए ही मुनि ने हृदय से लगा लिया। मुनि के मनका आनन्द कुछ कहा नहीं जाता। मानो उन्हें ब्रह्मानन्द की राशि मिल गयी हो॥४॥

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