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रामायण >> श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (अयोध्याकाण्ड) श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (अयोध्याकाण्ड)गोस्वामी तुलसीदास
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भारत की सर्वाधिक प्रचलित रामायण। द्वितीय सोपान अयोध्याकाण्ड
दो०- दीन्हि असीस मुनीस उर अति अनंदु अस जानि।
लोचन गोचर सुकृत फल मनहुँ किए बिधि आनि॥१०६॥
लोचन गोचर सुकृत फल मनहुँ किए बिधि आनि॥१०६॥
मुनीश्वर भरद्वाजजी ने आशीर्वाद दिया। उनके हृदय में ऐसा जानकर अत्यन्त आनन्द हुआ कि आज विधाताने [श्रीसीताजी और लक्ष्मणजी सहित प्रभु श्रीरामचन्द्रजी के दर्शन कराकर] मानो हमारे सम्पूर्ण पुण्यों के फल को लाकर आँखों के सामने कर दिया॥ १०६॥
कुसल प्रस्न करि आसन दीन्हे।
पूजि प्रेम परिपूरन कीन्हे॥
कंद मूल फल अंकुर नीके।
दिए आनि मुनि मनहुँ अमी के॥
पूजि प्रेम परिपूरन कीन्हे॥
कंद मूल फल अंकुर नीके।
दिए आनि मुनि मनहुँ अमी के॥
कुशल पूछकर मुनिराज ने उनको आसन दिये और प्रेम सहित पूजन करके उन्हें सन्तुष्ट कर दिया। फिर मानो अमृत के ही बने हों, ऐसे अच्छे-अच्छे कन्द, मूल, फल और अंकुर लाकर दिये॥१॥
सीय लखन जन सहित सुहाए।
अति रुचि राम मूल फल खाए॥
भए बिगतश्रम रामु सुखारे।
भरद्वाज मृदु बचन उचारे॥
अति रुचि राम मूल फल खाए॥
भए बिगतश्रम रामु सुखारे।
भरद्वाज मृदु बचन उचारे॥
सीताजी, लक्ष्मणजी और सेवक गुह सहित श्रीरामचन्द्रजी ने उन सुन्दर मूल फलों को बड़ी रुचि के साथ खाया। थकावट दूर होने से श्रीरामचन्द्रजी सुखी हो गये। तब भरद्वाजजी ने उनसे कोमल वचन कहे-॥२॥
आजु सुफल तपु तीरथ त्यागू।
आजु सुफल जप जोग बिरागू॥
सफल सकल सुभ साधन साजू।
राम तुम्हहि अवलोकत आजू॥
आजु सुफल जप जोग बिरागू॥
सफल सकल सुभ साधन साजू।
राम तुम्हहि अवलोकत आजू॥
हे राम! आपका दर्शन करते ही आज मेरा तप, तीर्थसेवन और त्याग सफल हो गया। आज मेरा जप, योग और वैराग्य सफल हो गया और आज मेरे सम्पूर्ण शुभ साधनों का समुदाय भी सफल हो गया॥३॥
लाभ अवधि सुख अवधि न दूजी।
तुम्हरें दरस आस सब पूजी।
अब करि कृपा देहु बर एहू।
निज पद सरसिज सहज सनेहू॥
तुम्हरें दरस आस सब पूजी।
अब करि कृपा देहु बर एहू।
निज पद सरसिज सहज सनेहू॥
लाभ की सीमा और सुख की सीमा [प्रभुके दर्शनको छोड़कर] दूसरी कुछ भी नहीं है। आपके दर्शन से मेरी सब आशाएँ पूर्ण हो गयीं। अब कृपा करके यह वरदान दीजिये कि आपके चरण कमलों में मेरा स्वाभाविक प्रेम हो॥४॥
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