रामायण >> श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (अयोध्याकाण्ड)

श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (अयोध्याकाण्ड)

गोस्वामी तुलसीदास

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2020
पृष्ठ :0
मुखपृष्ठ :
पुस्तक क्रमांक : 10
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भारत की सर्वाधिक प्रचलित रामायण। द्वितीय सोपान अयोध्याकाण्ड

दो०- करम बचन मन छाड़िछलु जब लगि जनुन तुम्हार।
तब लगि सुखु सपनेहुँ नहीं किएँ कोटि उपचार॥१०७॥

जब तक कर्म, वचन और मन से छल छोड़कर मनुष्य आपका दास नहीं हो जाता, तब तक करोड़ों उपाय करने से भी, स्वप्न में भी वह सुख नहीं पाता॥१०७॥

सुनि मुनि बचन रामु सकुचाने।
भाव भगति आनंद अघाने॥
तब रघुबर मुनि सुजसु सुहावा। कोटि भाँति कहि सबहि सुनावा॥

मुनिके वचन सुनकर, उनकी भाव-भक्ति के कारण आनन्द से तृप्त हुए भगवान् श्रीरामचन्द्रजी [लीला की दृष्टि से] सकुचा गये। तब [अपने ऐश्वर्यको छिपाते हुए] श्रीरामचन्द्रजी ने भरद्वाज मुनि का सुन्दर सुयश करोड़ों (अनेकों) प्रकार से कहकर सबको सुनाया॥१॥

सो बड़ सो सब गुन गन गेहू।
जेहि मुनीस तुम्ह आदर देहू॥
मुनि रघुबीर परसपर नवहीं।
बचन अगोचर सुखु अनुभवहीं॥

[उन्होंने कहा-] हे मुनीश्वर ! जिसको आप आदर दें, वही बड़ा है और वही सब गुण समूहों का घर है। इस प्रकार श्रीरामजी और मुनि भरद्वाजजी दोनों परस्पर विनम्र हो रहे हैं और अनिर्वचनीय सुख का अनुभव कर रहे हैं॥२॥

यह सुधि पाइ प्रयाग निवासी।
बटु तापस मुनि सिद्ध उदासी॥
भरद्वाज आश्रम सब आए।
देखन दसरथ सुअन सुहाए॥

यह (श्रीराम, लक्ष्मण और सीताजी के आने की) खबर पाकर प्रयाग निवासी ब्रह्मचारी, तपस्वी, मुनि, सिद्ध और उदासी सब श्रीदशरथजी के सुन्दर पुत्रों को देखने के लिये भरद्वाजजी के आश्रम पर आये॥३॥
 
राम प्रनाम कीन्ह सब काहू।
मुदित भए लहि लोयन लाहू।
देहिं असीस परम सुखु पाई।
फिरे सराहत सुंदरताई॥


श्रीरामचन्द्रजी ने सब किसी को प्रणाम किया। नेत्रों का लाभ पाकर सब आनन्दित हो गये और परम सुख पाकर आशीर्वाद देने लगे। श्रीरामजी के सौन्दर्यकी सराहना करते हुए वे लौटे॥४॥

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