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रामायण >> श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (अयोध्याकाण्ड) श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (अयोध्याकाण्ड)गोस्वामी तुलसीदास
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भारत की सर्वाधिक प्रचलित रामायण। द्वितीय सोपान अयोध्याकाण्ड
दो०- राम कीन्ह बिश्राम निसि प्रात प्रयाग नहाइ।
चले सहित सिय लखन जन मुदित मुनिहि सिरु नाइ॥१०८॥
चले सहित सिय लखन जन मुदित मुनिहि सिरु नाइ॥१०८॥
श्रीरामजी ने रात को वहीं विश्राम किया और प्रात:काल प्रयागराज का स्नान करके और प्रसन्नता के साथ मुनि को सिर नवाकर श्रीसीताजी, लक्ष्मणजी और सेवक गुह के साथ वे चले॥१०८।।
राम सप्रेम कहेउ मुनि पाहीं।
नाथ कहिअ हम केहि मग जाहीं॥
मुनि मन बिहसि राम सन कहहीं।
सुगम सकल मग तुम्ह कहुँ अहहीं॥
नाथ कहिअ हम केहि मग जाहीं॥
मुनि मन बिहसि राम सन कहहीं।
सुगम सकल मग तुम्ह कहुँ अहहीं॥
[चलते समय] बड़े प्रेम से श्रीरामजी ने मुनि से कहा- हे नाथ! बताइये हम किस मार्ग से जायँ। मुनि मन में हँसकर श्रीरामजी से कहते हैं कि आपके लिये सभी मार्ग सुगम हैं॥१॥
साथ लागि मुनि सिष्य बोलाए।
सुनि मन मुदित पचासक आए॥
सबन्हि राम पर प्रेम अपारा।
सकल कहहिं मगु दीख हमारा॥
सुनि मन मुदित पचासक आए॥
सबन्हि राम पर प्रेम अपारा।
सकल कहहिं मगु दीख हमारा॥
फिर उनके साथ के लिये मुनि ने शिष्यों को बुलाया। [साथ जाने की बात] सुनते ही चित्त में हर्षित हो कोई पचास शिष्य आ गये। सभी का श्रीरामजी पर अपार प्रेम है। सभी कहते हैं कि मार्ग हमारा देखा हुआ है॥२॥
मुनि बटु चारि संग तब दीन्हे।
जिन्ह बहु जनम सुकृत सब कीन्हे॥
करि प्रनामु रिषि आयसु पाई।
प्रमुदित हृदयँ चले रघुराई॥
जिन्ह बहु जनम सुकृत सब कीन्हे॥
करि प्रनामु रिषि आयसु पाई।
प्रमुदित हृदयँ चले रघुराई॥
तब मुनि ने [चुनकर] चार ब्रह्मचारियों को साथ कर दिया, जिन्होंने बहुत जन्मों तक सब सुकृत (पुण्य) किये थे। श्रीरघुनाथजी प्रणाम कर और ऋषि की आज्ञा पाकर हृदय में बड़े ही आनन्दित होकर चले॥३॥
ग्राम निकट जब निकसहिं जाई।
देखहिं दरसु नारि नर धाई॥
होहिं सनाथ जनम फलु पाई।
फिरहिं दुखित मनु संग पठाई।
देखहिं दरसु नारि नर धाई॥
होहिं सनाथ जनम फलु पाई।
फिरहिं दुखित मनु संग पठाई।
जब वे किसी गाँव के पास होकर निकलते हैं तब स्त्री-पुरुष दौड़कर उनके रूप को देखने लगते हैं। जन्म का फल पाकर वे [सदाके अनाथ] सनाथ हो जाते हैं और मन को नाथ के साथ भेजकर [शरीर से साथ न रहने के कारण] दुःखी होकर लौट आते हैं॥ ४॥
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