रामायण >> श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (अयोध्याकाण्ड)

श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (अयोध्याकाण्ड)

गोस्वामी तुलसीदास

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2020
पृष्ठ :0
मुखपृष्ठ :
पुस्तक क्रमांक : 10
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भारत की सर्वाधिक प्रचलित रामायण। द्वितीय सोपान अयोध्याकाण्ड

तापस प्रकरण



दो०- बिदा किए बटु बिनय करि फिरे पाइ मन काम।
उतरि नहाए जमुन जल जो सरीर सम स्याम॥१०९॥


तदनन्तर श्रीरामजी ने विनती करके चारों ब्रह्मचारियों को विदा किया; वे मनचाही वस्तु (अनन्य भक्ति) पाकर लौटे। यमुनाजी के पार उतरकर सबने यमुनाजी के जल में स्नान किया, जो श्रीरामचन्द्रजी के शरीर के समान ही श्याम रंग का था॥१०९॥

सुनत तीरबासी नर नारी।
धाए निज निज काज बिसारी॥
लखन राम सिय सुंदरताई।
देखि करहिं निज भाग्य बड़ाई॥


यमुनाजी के किनारे पर रहने वाले स्त्री-पुरुष [यह सुनकर कि निषाद के साथ दो परम सुन्दर सुकुमार नवयुवक और एक परम सुन्दरी स्त्री आ रही है] सब अपना अपना काम भूलकर दौड़े और लक्ष्मणजी, श्रीरामजी और सीताजी का सौन्दर्य देखकर अपने भाग्य की बड़ाई करने लगे॥१॥

अति लालसा बसहिं मन माहीं।
नाउँ गाउँ बूझत सकुचाहीं॥
जे तिन्ह महुँ बयबिरिध सयाने।
तिन्ह करि जुगुति रामु पहिचाने।

उनके मन में [परिचय जानने की] बहुत-सी लालसाएँ भरी हैं। पर वे नाम-गाँव पूछते सकुचाते हैं। उन लोगों में जो वयोवृद्ध और चतुर थे; उन्होंने युक्ति से श्रीरामचन्द्रजी को पहचान लिया॥२॥

सकल कथा तिन्ह सबहि सुनाई।
बनहि चले पितु आयसु पाई॥
सुनि सबिषाद सकल पछिताहीं।
रानी रायँ कीन्ह भल नाहीं॥


उन्होंने सब कथा सब लोगों को सुनायी कि पिता की आज्ञा पाकर ये वन को चले हैं। यह सुनकर सब लोग दुःखित हो पछता रहे हैं कि रानी और राजाने अच्छा नहीं किया॥३॥

तेहि अवसर एक तापसु आवा।
तेज पुंज लघुबयस सुहावा॥
कबि अलखित गति बेषु बिरागी।
मन क्रम बचन राम अनुरागी॥

उसी अवसर पर वहाँ एक तपस्वी आया, जो तेज का पुञ्ज, छोटी अवस्था का और सुन्दर था। उसकी गति कवि नहीं जानते [अथवा वह कवि था जो अपना परिचय नहीं देना चाहता]। वह वैरागी के वेष में था और मन, वचन तथा कर्म से श्रीरामचन्द्रजी का प्रेमी था॥४॥

[इस तेज:पुञ्ज तापस के प्रसंग को कुछ टीकाकार क्षेपक मानते हैं और कुछ लोगों के देखने में यह अप्रासंगिक और ऊपर से जोड़ा हुआ-सा जान भी पड़ता है, परन्तु यह सभी प्राचीन प्रतियों में है। गुसाईंजी अलौकिक अनुभवी पुरुष थे। पता नहीं, यहाँ इस प्रसंग के रखने में क्या रहस्य है; परन्तु यह क्षेपक तो नहीं है। इस तापस को जब 'कबि अलखित गति' कहते हैं, तब निश्चयपूर्वक कौन क्या कह सकता है। हमारी समझ से ये तापस या तो श्रीहनुमान् जी थे अथवा ध्यानस्थ तुलसीदासजी!]

परमात्मा की उपलब्धि अथवा तत्त्वज्ञान की साधना में लगे हुए साधकों में कुछ ऐसे होते हैं जो स्वभाववश इस ज्ञान से अन्य लोगों लाभान्वित करना चाहते हैं। परंतु कुछ ऐसे भी होते हैं जिन्हें प्रभु मिल जायें यही पर्याप्त है।
 

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