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रामायण >> श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (अयोध्याकाण्ड) श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (अयोध्याकाण्ड)गोस्वामी तुलसीदास
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भारत की सर्वाधिक प्रचलित रामायण। द्वितीय सोपान अयोध्याकाण्ड
दो०- सजल नयन तन पुलकि निज इष्टदेउ पहिचानि।
परेउ दंड जिमि धरनितल दसा न जाइ बखानि॥११०॥
परेउ दंड जिमि धरनितल दसा न जाइ बखानि॥११०॥
अपने इष्टदेव को पहचानकर उसके नेत्रों में जल भर आया और शरीर पुलकित हो गया। वह दण्ड की भाँति पृथ्वी पर गिर पड़ा, उसकी [प्रेमविह्वल] दशा का वर्णन नहीं किया जा सकता॥११०॥
राम सप्रेम पुलकि उर लावा।
परम रंक जनु पारसु पावा॥
मनहुँ प्रेमु परमारथु दोऊ।
मिलत धरे तन कह सबु कोऊ॥
परम रंक जनु पारसु पावा॥
मनहुँ प्रेमु परमारथु दोऊ।
मिलत धरे तन कह सबु कोऊ॥
श्रीरामजी ने प्रेमपूर्वक पुलकित होकर उसको हृदय से लगा लिया। [उसे इतना आनन्द हुआ] मानो कोई महादरिद्री मनुष्य पारस पा गया हो। सब कोई [देखनेवाले] कहने लगे कि मानो प्रेम और परमार्थ (परम तत्त्व) दोनों शरीर धारण करके मिल रहे हैं॥१॥
बहुरि लखन पायन्ह सोइ लागा।
लीन्ह उठाइ उमगि अनुरागा।
पुनि सिय चरन धूरि धरि सीसा।
जननि जानि सिसु दीन्हि असीसा॥
लीन्ह उठाइ उमगि अनुरागा।
पुनि सिय चरन धूरि धरि सीसा।
जननि जानि सिसु दीन्हि असीसा॥
फिर वह लक्ष्मणजी के चरणों लगा। उन्होंने प्रेम से उमँगकर उसको उठा लिया। फिर उसने सीताजी की चरणधूलि को अपने सिर पर धारण किया। माता सीताजी ने भी उसको अपना छोटा बच्चा जानकर आशीर्वाद दिया॥२॥
कीन्ह निषाद दंडवत तेही।
मिलेउ मुदित लखि राम सनेही॥
पिअत नयन पुट रूपु पियूषा।
मुदित सुअसनु पाइ जिमि भूखा॥
मिलेउ मुदित लखि राम सनेही॥
पिअत नयन पुट रूपु पियूषा।
मुदित सुअसनु पाइ जिमि भूखा॥
फिर निषादराज ने उसको दण्डवत् की। श्रीरामचन्द्रजी का प्रेमी जानकर वह उस (निषाद) से आनन्दित होकर मिला। वह तपस्वी अपने नेत्ररूपी दोनों से श्रीरामजी की सौन्दर्य-सुधा का पान करने लगा और ऐसा आनन्दित हुआ जैसे कोई भूखा आदमी सुन्दर भोजन पाकर आनन्दित होता है।।३।।
ते पितु मातु कहहु सखि कैसे।
जिन्ह पठए बन बालक ऐसे॥
राम लखन सिय रूपु निहारी।
होहिं सनेह बिकल नर नारी॥
जिन्ह पठए बन बालक ऐसे॥
राम लखन सिय रूपु निहारी।
होहिं सनेह बिकल नर नारी॥
[इधर गाँव की स्त्रियाँ कह रही हैं-] हे सखी! कहो तो,वे माता-पिता कैसे हैं जिन्होंने ऐसे (सुन्दर सुकुमार) बालकों को वन में भेज दिया है। श्रीरामजी, लक्षाणजी और सीताजी के रूपको देखकर सब स्त्री-पुरुष स्नेहसे व्याकुल हो जाते हैं॥४॥
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