रामायण >> श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (अयोध्याकाण्ड)

श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (अयोध्याकाण्ड)

गोस्वामी तुलसीदास

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2020
पृष्ठ :0
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पुस्तक क्रमांक : 10
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भारत की सर्वाधिक प्रचलित रामायण। द्वितीय सोपान अयोध्याकाण्ड

दो०- स्यामल गौर किसोर बर सुंदर सुषमा ऐन।
सरद सर्बरीनाथ मुखु सरद सरोरुह नैन॥११६॥


श्याम और गौर वर्ण है, सुन्दर किशोर अवस्था है; दोनों ही परम सुन्दर और शोभाके धाम हैं। शरत् पूर्णिमा के चन्द्रमाके समान इनके मुख और शरद्-ऋतु के कमल के समान इनके नेत्र हैं।११६॥

मासपारायण, सोलहवाँ विश्राम
नवाह्नपारायण, चौथा विश्राम

कोटि मनोज लजावनिहारे।
सुमुखि कहहु को आहिं तुम्हारे।
सुनि सनेहमय मंजुल बानी।
सकुची सिय मन महुँ मुसुकानी॥

हे सुमुखि! कहो तो अपनी सुन्दरतासे करोड़ों कामदेवों को लजाने वाले ये तुम्हारे कौन हैं ? उनकी ऐसी प्रेममयी सुन्दर वाणी सुनकर सीताजी सकुचा गयीं और मन ही-मन मुसकरायीं॥१॥

तिन्हहि बिलोकि बिलोकति धरनी।
दुहुँ सकोच सकुचति बरबरनी॥
सकुचि सप्रेम बाल मृग नयनी।
बोली मधुर बचन पिकबयनी॥

उत्तम (गौर) वर्ण वाली सीताजी उनको देखकर [संकोचवश] पृथ्वी की ओर देखती हैं। वे दोनों ओर के संकोच से सकुचा रही हैं (अर्थात् न बताने में ग्राम की स्त्रियों को दुःख होने का संकोच है और बताने में लज्जारूप संकोच)। हिरण के बच्चे के सदृश नेत्रवाली और कोकिल की-सी वाणी वाली सीताजी सकुचाकर प्रेमसहित मधुर वचन बोलीं-॥२॥

सहज सुभाय सुभग तन गोरे।
नामु लखनु लघु देवर मोरे॥
बहुरि बदनु बिधु अंचल ढाँकी।
पिय तन चितइ भौंह करि बाँकी।

ये जो सहजस्वभाव, सुन्दर और गोरे शरीर के हैं, उनका नाम लक्ष्मण है; ये मेरे छोटे देवर हैं। फिर सीताजी ने [लज्जावश] अपने चन्द्रमुख को आँचल से ढककर और प्रियतम (श्रीरामजी) की ओर निहार कर भौंहें टेढ़ी करके,॥३॥

खंजन मंजु तिरीछे नयननि।
निज पति कहेउ तिन्हहि सियँ सयननि॥
भई मुदित सब ग्रामबधूटी।
रंकन्ह राय रासि जनु लूटीं॥

खंजन पक्षी के-से सुन्दर नेत्रों को तिरछा करके सीताजी ने इशारे से उन्हें कहा कि ये (श्रीरामचन्द्रजी) मेरे पति हैं। यह जानकर गाँव की सब युवती स्त्रियाँ इस प्रकार आनन्दित हुईं मानो कंगालों ने धन की राशियाँ लूट ली हों॥४॥

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