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रामायण >> श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (अयोध्याकाण्ड) श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (अयोध्याकाण्ड)गोस्वामी तुलसीदास
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भारत की सर्वाधिक प्रचलित रामायण। द्वितीय सोपान अयोध्याकाण्ड
दो०- अति सप्रेम सिय पायँ परि बहुबिधि देहिं असीस।
सदा सोहागिनि होहु तुम्ह जब लगि महि अहि सीस॥११७॥
सदा सोहागिनि होहु तुम्ह जब लगि महि अहि सीस॥११७॥
वे अत्यन्त प्रेम से सीताजीके पैरों पड़कर बहुत प्रकारसे आशिष देती हैं (शुभ कामना करती हैं) कि जब तक शेषजी के सिरपर पृथ्वी रहे, तब तक तुम सदा सुहागिनी बनी रहो,॥११७॥
पारबती सम पतिप्रिय होहू।
देबि न हम पर छाड़ब छोहू॥
पुनि पुनि बिनय करिअ कर जोरी।
जौं एहि मारग फिरिअ बहोरी॥
देबि न हम पर छाड़ब छोहू॥
पुनि पुनि बिनय करिअ कर जोरी।
जौं एहि मारग फिरिअ बहोरी॥
और पार्वतीजी के समान अपने पतिकी प्यारी होओ। हे देवि! हम पर कृपा न छोड़ना (बनाये रखना)। हम बार-बार हाथ जोड़कर विनती करती हैं जिसमें आप फिर इसी रास्ते लौटें,॥१॥
दरसनु देब जानि निज दासी।
लखीं सीयँ सब प्रेम पिआसी॥
मधुर बचन कहि कहि परितोषीं।
जनु कुमुदिनी कौमुदी पोषीं।
लखीं सीयँ सब प्रेम पिआसी॥
मधुर बचन कहि कहि परितोषीं।
जनु कुमुदिनी कौमुदी पोषीं।
और हमें अपनी दासी जानकर दर्शन दें। सीताजी ने उन सबको प्रेम की प्यासी देखा, और मधुर वचन कह-कहकर उनका भलीभाँति सन्तोष किया। मानो चाँदनी ने कुमुदिनियों को खिलाकर पुष्ट कर दिया हो॥२॥
तबहिं लखन रघुबर रुख जानी।
पूँछेउ मगु लोगन्हि मृदु बानी॥
सुनत नारि नर भए दुखारी।
पुलकित गात बिलोचन बारी॥
पूँछेउ मगु लोगन्हि मृदु बानी॥
सुनत नारि नर भए दुखारी।
पुलकित गात बिलोचन बारी॥
उसी समय श्रीरामचन्द्रजी का रुख जानकर लक्ष्मणजी ने कोमल वाणी से लोगों से रास्ता पूछा। यह सुनते ही स्त्री-पुरुष दु:खी हो गये। उनके शरीर पुलकित हो गये और नेत्रों में [वियोगकी सम्भावनासे प्रेमका] जल भर आया॥३॥
मिटा मोदु मन भए मलीने।
बिधि निधि दीन्ह लेत जनु छीने॥
समुझि करम गति धीरजु कीन्हा।
सोधि सुगम मगु तिन्ह कहि दीन्हा॥
बिधि निधि दीन्ह लेत जनु छीने॥
समुझि करम गति धीरजु कीन्हा।
सोधि सुगम मगु तिन्ह कहि दीन्हा॥
उनका आनन्द मिट गया और मन ऐसे उदास हो गये मानो विधाता दी हुई सम्पत्ति छीने लेता हो। कर्म की गति समझकर उन्होंने धैर्य धारण किया और अच्छी तरह निर्णय करके सुगम मार्ग बतला दिया॥४॥
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