|
रामायण >> श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (अयोध्याकाण्ड) श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (अयोध्याकाण्ड)गोस्वामी तुलसीदास
|
|
||||||
भारत की सर्वाधिक प्रचलित रामायण। द्वितीय सोपान अयोध्याकाण्ड
दो०- लखन जानकी सहित तब गवनु कीन्ह रघुनाथ।
फेरे सब प्रिय बचन कहि लिए लाइ मन साथ॥११८॥
फेरे सब प्रिय बचन कहि लिए लाइ मन साथ॥११८॥
तब लक्ष्मणजी और जानकीजी सहित श्रीरघुनाथजी ने गमन किया और सब लोगों को प्रिय वचन कहकर लौटाया, किन्तु उनके मनोंको अपने साथ ही लगा लिया॥११८॥
फिरत नारि नर अति पछिताहीं।
दैअहिं दोषु देहिं मन माहीं॥
सहित बिषाद परसपर कहहीं।
बिधि करतब उलटे सब अहहीं।
दैअहिं दोषु देहिं मन माहीं॥
सहित बिषाद परसपर कहहीं।
बिधि करतब उलटे सब अहहीं।
लौटते हुए वे स्त्री-पुरुष बहुत ही पछताते हैं और मन-ही-मन दैव को दोष देते हैं। परस्पर [बड़े ही] विषाद के साथ कहते हैं कि विधाता के सभी काम उलटे हैं॥१॥
निपट निरंकुस निठुर निसंकू।
जेहिं ससि कीन्ह सरुज सकलंकू॥
रूख कलपतरु सागरु खारा।
तेहिं पठए बन राजकुमारा॥
जेहिं ससि कीन्ह सरुज सकलंकू॥
रूख कलपतरु सागरु खारा।
तेहिं पठए बन राजकुमारा॥
वह विधाता बिलकुल निरंकुश (स्वतन्त्र), निर्दय और निडर है, जिसने चन्द्रमा को रोगी (घटने-बढ़नेवाला) और कलंकी बनाया, कल्पवृक्ष को पेड़ और समुद्र को खारा बनाया। उसीने इन राजकुमारों को वन में भेजा है॥२॥
जौं पै इन्हहि दीन्ह बनबासू।
कीन्ह बादि बिधि भोग बिलासू॥
ए बिचरहिं मग बिनु पदत्राना।
रचे बादि बिधि बाहन नाना॥
कीन्ह बादि बिधि भोग बिलासू॥
ए बिचरहिं मग बिनु पदत्राना।
रचे बादि बिधि बाहन नाना॥
जब विधाता ने इनको वनवास दिया है, तब उसने भोग-विलास व्यर्थ ही बनाये। जब ये बिना जूते के (नंगे ही पैरों) रास्ते में चल रहे हैं, तब विधाता अनेकों वाहन (सवारियाँ) व्यर्थ ही रचे॥३॥
ए महि परहिं डासि कुस पाता।
सुभग सेज कत सृजत बिधाता॥
तरुबर बास इन्हहि बिधि दीन्हा।
धवल धाम रचि रचि श्रमु कीन्हा॥
सुभग सेज कत सृजत बिधाता॥
तरुबर बास इन्हहि बिधि दीन्हा।
धवल धाम रचि रचि श्रमु कीन्हा॥
जब ये कुश और पत्ते बिछाकर जमीन पर ही पड़े रहते हैं, तब विधाता सुन्दर सेज (पलंग और बिछौने) किसलिये बनाता है? विधाता ने जब इनको बड़े-बड़े पेड़ों [के नीचे] का निवास दिया, तब उज्ज्वल महलों को बना-बनाकर उसने व्यर्थ ही परिश्रम किया॥४॥
|
|||||
लोगों की राय
No reviews for this book






