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रामायण >> श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (अयोध्याकाण्ड) श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (अयोध्याकाण्ड)गोस्वामी तुलसीदास
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भारत की सर्वाधिक प्रचलित रामायण। द्वितीय सोपान अयोध्याकाण्ड
दो०- स्वामि सखा पितु मातु गुर जिन्ह के सब तुम्ह तात।
मन मंदिर तिन्ह कें बसहु सीय सहित दोउ भ्रात॥१३०॥
मन मंदिर तिन्ह कें बसहु सीय सहित दोउ भ्रात॥१३०॥
हे तात! जिनके स्वामी, सखा, पिता, माता और गुरु सब कुछ आप ही हैं, उनके मनरूपी
मन्दिर में सीतासहित आप दोनों भाई निवास कीजिये॥१३०॥
अवगुन तजि सब के गुन गहहीं।
बिप्र धेनु हित संकट सहहीं॥
नीति निपुन जिन्ह कइ जग लीका।
घर तुम्हार तिन्ह कर मनु नीका॥
बिप्र धेनु हित संकट सहहीं॥
नीति निपुन जिन्ह कइ जग लीका।
घर तुम्हार तिन्ह कर मनु नीका॥
जो अवगुणों को छोड़कर सबके गुणों को ग्रहण करते हैं, ब्राह्मण और गौ के लिये
संकट सहते हैं, नीति-निपुणता में जिनकी जगत्में मर्यादा है, उनका सुन्दर मन
आपका घर है॥१॥
गुन तुम्हार समुझइ निज दोसा।
जेहि सब भाँति तुम्हार भरोसा॥
राम भगत प्रिय लागहिं जेही।
तेहि उर बसहु सहित बैदेही।
जेहि सब भाँति तुम्हार भरोसा॥
राम भगत प्रिय लागहिं जेही।
तेहि उर बसहु सहित बैदेही।
जो गुणों को आपका और दोषों को अपना समझता है, जिसे सब प्रकार से आपका ही भरोसा
है, और रामभक्त जिसे प्यारे लगते हैं, उसके हृदय में आप सीता सहित निवास
कीजिये॥२॥
जाति पाँति धनु धरमु बड़ाई।
प्रिय परिवार सदन सुखदाई।
सब तजि तुम्हहि रहइ उर लाई।
तेहि के हृदयँ रहहु रघुराई।
प्रिय परिवार सदन सुखदाई।
सब तजि तुम्हहि रहइ उर लाई।
तेहि के हृदयँ रहहु रघुराई।
जाति, पाँति, धन, धर्म, बड़ाई, प्यारा परिवार और सुख देने वाला घर-सबको छोड़कर
जो केवल आपको ही हृदय में धारण किये रहता है, हे रघुनाथजी! आप उसके हृदय में
रहिये॥३॥
सरगु नरकु अपबरगु समाना।
जहँ तहँ देख धरें धनु बाना॥
करम बचन मन राउर चेरा।
राम करहु तेहि के उर डेरा॥
जहँ तहँ देख धरें धनु बाना॥
करम बचन मन राउर चेरा।
राम करहु तेहि के उर डेरा॥
स्वर्ग, नरक और मोक्ष जिसकी दृष्टि में समान हैं, क्योंकि वह जहाँ-तहाँ (सब
जगह) केवल धनुष-बाण धारण किये आपको ही देखता है; और जो कर्म से, वचन से और मनसे
आपका दास है, हे रामजी! आप उसके हृदय में डेरा कीजिये॥४॥
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