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रामायण >> श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (अयोध्याकाण्ड) श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (अयोध्याकाण्ड)गोस्वामी तुलसीदास
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भारत की सर्वाधिक प्रचलित रामायण। द्वितीय सोपान अयोध्याकाण्ड
दो०- जाहि न चाहिअ कबहुँ कछु तुम्ह सन सहज सनेहु।
बसहु निरंतर तासु मन सो राउर निज गेहु॥१३१॥
बसहु निरंतर तासु मन सो राउर निज गेहु॥१३१॥
जिसको कभी कुछ भी नहीं चाहिये और जिसका आपसे स्वाभाविक प्रेम है, आप उसके मन
में निरन्तर निवास कीजिये; वह आपका अपना घर है॥१३१॥
एहि बिधि मुनिबर भवन देखाए।
बचन सप्रेम राम मन भाए।
कह मुनि सुनहु भानुकुलनायक।
आश्रम कहउँ समय सुखदायक।
बचन सप्रेम राम मन भाए।
कह मुनि सुनहु भानुकुलनायक।
आश्रम कहउँ समय सुखदायक।
इस प्रकार मुनिश्रेष्ठ वाल्मीकिजी ने श्रीरामचन्द्रजी को घर दिखाये। उनके
प्रेमपूर्ण वचन श्रीरामजी के मन को अच्छे लगे। फिर मुनि ने कहा-हे सूर्यकुलके
स्वामी! सुनिये, अब मैं इस समय के लिये सुखदायक आश्रम कहता हूँ (निवासस्थान
बतलाता हूँ)॥१॥
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