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रामायण >> श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (अयोध्याकाण्ड) श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (अयोध्याकाण्ड)गोस्वामी तुलसीदास
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भारत की सर्वाधिक प्रचलित रामायण। द्वितीय सोपान अयोध्याकाण्ड
चित्रकूट में निवास, कोल-भीलों के द्वारा सेवा
चित्रकूट गिरि करहु निवासू।
तहँ तुम्हार सब भाँति सुपासू॥
सैलु सुहावन कानन चारू।
करि केहरि मृग बिहग बिहारू॥
तहँ तुम्हार सब भाँति सुपासू॥
सैलु सुहावन कानन चारू।
करि केहरि मृग बिहग बिहारू॥
आप चित्रकूट पर्वतपर निवास कीजिये, वहाँ आपके लिये सब प्रकारकी सुविधा है।
सुहावना पर्वत है और सुन्दर वन है। वह हाथी, सिंह, हिरन और पक्षियोंका
विहारस्थल है॥२॥
नदी पुनीत पुरान बखानी।
अत्रिप्रिया निज तप बल आनी॥
सुरसरि धार नाउँ मंदाकिनि।
जो सब पातक पोतक डाकिनि॥
अत्रिप्रिया निज तप बल आनी॥
सुरसरि धार नाउँ मंदाकिनि।
जो सब पातक पोतक डाकिनि॥
वहाँ पवित्र नदी है, जिसकी पुराणोंने प्रशंसा की है, और जिसको अत्रि ऋषिकी
पत्नी अनसूयाजी अपने तपोबलसेलायी थीं।वह गङ्गाजीकी धारा है, उसका मन्दाकिनी नाम
है। वह सब पापरूपी बालकोंको खा डालनेके लिये डाकिनी (डाइन) रूप है॥३॥
अत्रि आदि मुनिबर बहु बसहीं।
करहिं जोग जप तप तन कसहीं।
चलहु सफल श्रम सब कर करहू।
राम देहु गौरव गिरिबरहू॥
करहिं जोग जप तप तन कसहीं।
चलहु सफल श्रम सब कर करहू।
राम देहु गौरव गिरिबरहू॥
अत्रि आदि बहुत-से श्रेष्ठ मुनि वहाँ निवास करते हैं, जो योग, जप और तप करते
हुए शरीर को कसते हैं। हे रामजी! चलिये, सबके परिश्रम को सफल कीजिये और
पर्वतश्रेष्ठ चित्रकूट को भी गौरव दीजिये॥४॥
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