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रामायण >> श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (अयोध्याकाण्ड) श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (अयोध्याकाण्ड)गोस्वामी तुलसीदास
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भारत की सर्वाधिक प्रचलित रामायण। द्वितीय सोपान अयोध्याकाण्ड
दो०- चित्रकूट महिमा अमित कही महामुनि गाइ।
आइ नहाए सरित बर सिय समेत दोउ भाइ॥१३२॥
आइ नहाए सरित बर सिय समेत दोउ भाइ॥१३२॥
महामुनि वाल्मीकिजीने चित्रकूटकी अपरिमित महिमा बखानकर कही। तब सीताजीसहित
दोनों भाइयोंने आकर श्रेष्ठ नदी मन्दाकिनीमें स्नान किया॥१३२॥
रघुबर कहेउ लखन भल घाटू।
करहु कतहुँ अब ठाहर ठाटू॥
लखन दीख पय उतर करारा।
चहुँ दिसि फिरेउ धनुष जिमि नारा॥
करहु कतहुँ अब ठाहर ठाटू॥
लखन दीख पय उतर करारा।
चहुँ दिसि फिरेउ धनुष जिमि नारा॥
श्रीरामचन्द्रजीने कहा-लक्ष्मण ! बड़ा अच्छा घाट है। अब यहीं कहीं ठहरने की
व्यवस्था करो। तब लक्ष्मणजी ने पयस्विनी नदी के उत्तर के ऊँचे किनारे को देखा
[और कहा कि-] इसके चारों ओर धनुष के-जैसा एक नाला फिरा हुआ है॥१॥
नदी पनच सर सम दम दाना।
सकल कलुष कलि साउज नाना॥
चित्रकूट जनु अचल अहेरी।
चुकइ न घात मार मुठभेरी॥
सकल कलुष कलि साउज नाना॥
चित्रकूट जनु अचल अहेरी।
चुकइ न घात मार मुठभेरी॥
नदी (मन्दाकिनी) उस धनुष की प्रत्यञ्चा (डोरी) है और शम, दम, दान बाण हैं।
कलियुग के समस्त पाप उसके अनेकों हिंसक पशु [रूप निशाने] हैं। चित्रकूट ही मानो
अचल शिकारी है, जिसका निशाना कभी चूकता नहीं, और जो सामने से मारता है॥२॥
अस कहि लखन ठाउँ देखरावा।
थलु बिलोकि रघुबर सुखु पावा॥
रमेउ राम मनु देवन्ह जाना।
चले सहित सुर थपति प्रधाना॥
थलु बिलोकि रघुबर सुखु पावा॥
रमेउ राम मनु देवन्ह जाना।
चले सहित सुर थपति प्रधाना॥
ऐसा कहकर लक्ष्मणजी ने स्थान दिखलाया। स्थान को देखकर श्रीरामचन्द्रजी ने सुख
पाया। जब देवताओं ने जाना कि श्रीरामचन्द्रजी का मन यहाँ रम गया तब वे देवताओं
के प्रधान थवई (मकान बनानेवाले) विश्वकर्माको साथ लेकर चले॥३॥
कोल किरात बेष सब आए।
रचे परन तृन सदन सुहाए।
बरनि न जाहिं मंजु दुइ साला।
एक ललित लघु एक बिसाला॥
रचे परन तृन सदन सुहाए।
बरनि न जाहिं मंजु दुइ साला।
एक ललित लघु एक बिसाला॥
सब देवता कोल-भीलोंके वेषमें आये और उन्होंने [दिव्य] पत्तों और घासोंके सुन्दर
घर बना दिये। दो ऐसी सुन्दर कुटियाँ बनायीं जिनका वर्णन नहीं हो सकता। उनमें एक
बड़ी सुन्दर छोटी-सी थी और दूसरी बड़ी थी॥ ४॥
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