रामायण >> श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (अयोध्याकाण्ड)

श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (अयोध्याकाण्ड)

गोस्वामी तुलसीदास

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2020
पृष्ठ :0
मुखपृष्ठ :
पुस्तक क्रमांक : 10
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भारत की सर्वाधिक प्रचलित रामायण। द्वितीय सोपान अयोध्याकाण्ड

दो०- लखन जानकी सहित प्रभु राजत रुचिर निकेत।
सोह मदनु मुनि बेष जनु रति रितुराज समेत॥१३३॥

लक्ष्मणजी और जानकीजी सहित प्रभु श्रीरामचन्द्रजी सुन्दर घास-पत्तों के घर में शोभायमान हैं। मानो कामदेव मुनि का वेष धारण करके पत्नी रति और वसन्त-ऋतु के साथ सुशोभित हो। १३३॥

मासपारायण, सत्रहवाँ विश्राम

अमर नाग किंनर दिसिपाला।
चित्रकूट आए तेहि काला॥
राम प्रनामु कीन्ह सब काहू।
मुदित देव लहि लोचन लाहू॥


उस समय देवता, नाग, किन्नर और दिक्पाल चित्रकूटमें आये और श्रीरामचन्द्रजीने सब किसीको प्रणाम किया। देवता नेत्रोंका लाभ पाकर आनन्दित हुए॥१॥

बरषि सुमन कह देव समाजू।
नाथ सनाथ भए हम आजू॥
करि बिनती दुख दुसह सुनाए।
हरषित निज निज सदन सिधाए॥

फूलों की वर्षा करके देवसमाज ने कहा-हे नाथ! आज [आपका दर्शन पाकर] हम सनाथ हो गये। फिर विनती करके उन्होंने अपने दुःसह दुःख सुनाये और [दुःखों के
नाश का आश्वासन पाकर] हर्षित होकर अपने-अपने स्थानों को चले गये॥२॥

चित्रकूट रघुनंदनु छाए।
समाचार सुनि सुनि मुनि आए।
आवत देखि मुदित मुनिबंदा।
कीन्ह दंडवत रघुकुल चंदा॥


श्रीरघुनाथजी चित्रकूट में आ बसे हैं, यह समाचार सुन-सुनकर बहुत-से मुनि आये। रघुकुल के चन्द्रमा श्रीरामचन्द्रजी ने मुदित हुई मुनिमण्डली को आते देखकर दण्डवत् प्रणाम किया।॥३॥

मुनि रघुबरहि लाइ उर लेहीं।
सुफल होन हित आसिष देहीं॥
सिय सौमित्रि राम छबि देखहिं।
साधन सकल सफल करि लेखहिं।


मुनिगण श्रीरामजी को हृदय से लगा लेते हैं और सफल होने के लिये आशीर्वाद देते हैं। वे सीताजी, लक्ष्मणजी और श्रीरामचन्द्रजी की छवि देखते हैं और अपने सारे साधनों को सफल हुआ समझते हैं॥४॥

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