रामायण >> श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (अयोध्याकाण्ड)

श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (अयोध्याकाण्ड)

गोस्वामी तुलसीदास

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2020
पृष्ठ :0
मुखपृष्ठ :
पुस्तक क्रमांक : 10
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भारत की सर्वाधिक प्रचलित रामायण। द्वितीय सोपान अयोध्याकाण्ड

दो०- जथाजोग सनमानि प्रभु बिदा किए मुनिबंद।
करहिं जोग जप जाग तप निज आश्रमन्हि सुछंद॥१३४॥


प्रभु श्रीरामचन्द्रजी ने यथायोग्य सम्मान करके मुनिमण्डली को विदा किया। [श्रीरामचन्द्रजी के आ जानेसे] वे सब अपने-अपने आश्रमों में अब स्वतन्त्रता के साथ योग, जप, यज्ञ और तप करने लगे॥ १३४॥

यह सुधि कोल किरातन्ह पाई।
हरषे जनु नव निधि घर आई।
कंद मूल फल भरि भरि दोना।
चले रंक जनु लूटन सोना॥


यह (श्रीरामजीके आगमनका) समाचार जब कोल-भीलों ने पाया, तो वे ऐसे हर्षित हुए मानो नवों निधियाँ उनके घरहीपर आ गयी हों। वे दोनों में कन्द, मूल, फल भर-भरकर चले। मानो दरिद्र सोना लूटने चले हों॥१॥

तिन्ह महँ जिन्ह देखे दोउ भ्राता।
अपर तिन्हहि पूँछहिं मगु जाता॥
कहत सुनत रघुबीर निकाई।
आइ सबन्हि देखे रघुराई॥


उनमें से जो दोनों भाइयों को [पहले] देख चुके थे, उनसे दूसरे लोग रास्ते में जाते हुए पूछते हैं। इस प्रकार श्रीरामचन्द्रजी की सुन्दरता कहते-सुनते सबने आकर श्रीरघुनाथजी के दर्शन किये॥२॥

करहिं जोहारु भेंट धरि आगे।
प्रभुहि बिलोकहिं अति अनुरागे॥
चित्र लिखे जनु जहँ तहँ ठाढ़े।
पुलक सरीर नयन जल बाढ़े॥


भेंट आगे रखकर वे लोग जोहार करते हैं और अत्यन्त अनुराग के साथ प्रभु को देखते हैं। वे मुग्ध हुए जहाँ-के-तहाँ मानो चित्रलिखे-से खड़े हैं। उनके शरीर पुलकित हैं और नेत्रों में प्रेमाश्रुओं के जल की बाढ़ आ रही है॥ ३॥

राम सनेह मगन सब जाने।
कहि प्रिय बचन सकल सनमाने।
प्रभुहि जोहारि बहोरि बहोरी।
बचन बिनीत कहहिं कर जोरी॥


श्रीरामजी ने उन सबको प्रेम में मग्न जाना, और प्रिय वचन कहकर सबका सम्मान किया। वे बार-बार प्रभु श्रीरामचन्द्रजी को जोहार करते हुए हाथ जोड़कर विनीत वचन कहते हैं-॥४॥

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