|
रामायण >> श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (अयोध्याकाण्ड) श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (अयोध्याकाण्ड)गोस्वामी तुलसीदास
|
|
||||||
भारत की सर्वाधिक प्रचलित रामायण। द्वितीय सोपान अयोध्याकाण्ड
दो०- अब हम नाथ सनाथ सब भए देखि प्रभु पाय।
भाग हमारें आगमनु राउर कोसलराय॥१३५॥
भाग हमारें आगमनु राउर कोसलराय॥१३५॥
हे नाथ! प्रभु (आप) के चरणोंका दर्शन पाकर अब हम सब सनाथ हो गये। हे कोसलराज!
हमारे ही भाग्यसे आपका यहाँ शुभागमन हुआ है।। १३५।।
धन्य भूमि बन पंथ पहारा।
जहँ जहँ नाथ पाउ तुम्ह धारा॥
धन्य बिहग मृग काननचारी।
सफल जनम भए तुम्हहि निहारी॥
जहँ जहँ नाथ पाउ तुम्ह धारा॥
धन्य बिहग मृग काननचारी।
सफल जनम भए तुम्हहि निहारी॥
हे नाथ! जहाँ-जहाँ आपने अपने चरण रखे हैं, वे पृथ्वी, वन, मार्ग और पहाड़ धन्य
हैं, वे वन में विचरने वाले पक्षी और पशु धन्य हैं, जो आपको देखकर सफल जन्म हो
गये॥१॥
हम सब धन्य सहित परिवारा।
दीख दरसु भरि नयन तुम्हारा॥
कीन्ह बासु भल ठाउँ बिचारी।
इहाँ सकल रितु रहब सुखारी॥
दीख दरसु भरि नयन तुम्हारा॥
कीन्ह बासु भल ठाउँ बिचारी।
इहाँ सकल रितु रहब सुखारी॥
हम सब भी अपने परिवार सहित धन्य हैं, जिन्होंने नेत्र भरकर आपका दर्शन किया।
आपने बड़ी अच्छी जगह विचारकर निवास किया है। यहाँ सभी ऋतुओं में
आप सुखी रहियेगा॥२॥
हम सब भाँति करब सेवकाई।
करि केहरि अहि बाघ बराई।
बन बेहड़ गिरि कंदर खोहा।
सब हमार प्रभु पग पग जोहा॥
करि केहरि अहि बाघ बराई।
बन बेहड़ गिरि कंदर खोहा।
सब हमार प्रभु पग पग जोहा॥
हमलोग सब प्रकार से हाथी, सिंह, सर्प और बाघों से बचाकर आपकी सेवा करेंगे। हे
प्रभो! यहाँ के बीहड़ वन, पहाड़, गुफाएँ और खोह (रे) सब पग-पग हमारे देखे हुए
हैं॥३॥
तहँ तहँ तुम्हहि अहेर खेलाउब।
सर निरझर जलठाउँ देखाउब॥
हम सेवक परिवार समेता।
नाथ न सकुचब आयसु देता।
सर निरझर जलठाउँ देखाउब॥
हम सेवक परिवार समेता।
नाथ न सकुचब आयसु देता।
हम वहाँ-वहाँ (उन-उन स्थानों में) आपको शिकार खिलावेंगे और तालाब, झरने आदि
जलाशयों को दिखावेंगे। हम कुटुम्ब समेत आपके सेवक हैं। हे नाथ! इसलिये हमें
आज्ञा देने में संकोच न कीजियेगा॥४॥
|
|||||
लोगों की राय
No reviews for this book






