रामायण >> श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (अयोध्याकाण्ड)

श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (अयोध्याकाण्ड)

गोस्वामी तुलसीदास

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2020
पृष्ठ :0
मुखपृष्ठ :
पुस्तक क्रमांक : 10
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भारत की सर्वाधिक प्रचलित रामायण। द्वितीय सोपान अयोध्याकाण्ड

दो०- बेद बचन मुनि मन अगम ते प्रभु करुना ऐन।
बचन किरातन्ह के सुनत जिमि पितु बालक बैन॥१३६॥


जो वेदोंके वचन और मुनियों के मन को भी अगम हैं, वे करुणा के धाम प्रभु श्रीरामचन्द्रजी भीलों के वचन इस तरह सुन रहे हैं जैसे पिता बालकों के वचन सुनता है।। १३६॥

रामहि केवल प्रेमु पिआरा।
जानि लेउ जो जाननिहारा॥
राम सकल बनचर तब तोषे।
कहि मृदु बचन प्रेम परिपोषे॥


श्रीरामचन्द्रजी को केवल प्रेम प्यारा है; जो जानने वाला हो (जानना चाहता हो), वह जान ले। तब श्रीरामचन्द्रजी ने प्रेम से परिपुष्ट हुए (प्रेमपूर्ण) कोमल वचन कहकर उन सब वन में विचरण करने वाले लोगों को संतुष्ट किया॥१॥

बिदा किए सिर नाइ सिधाए।
प्रभु गुन कहत सुनत घर आए।
एहि बिधि सिय समेत दोउ भाई।
बसहिं बिपिन सुर मुनि सुखदाई॥


फिर उनको विदा किया। वे सिर नवाकर चले और प्रभुके गुण कहते-सुनते घर आये। इस प्रकार देवता और मुनियों को सुख देने वाले दोनों भाई सीताजी समेत वन में निवास करने लगे॥२॥

जब तें आइ रहे रघुनायकु।
तब तें भयउ बनु मंगलदायकु॥
फूलहिं फलहिं बिटप बिधि नाना।
मंजु बलित बर बेलि बिताना॥


जबसे श्रीरघुनाथजी वन में आकर रहे तब से वन मङ्गलदायक हो गया। अनेकों प्रकार के वृक्ष फूलते और फलते हैं और उनपर लिपटी हुई सुन्दर बेलोंके मण्डप तने हैं॥३॥

सुरतरु सरिस सुभायँ सुहाए।
मनहुँ बिबुध बन परिहरि आए।
गुंज मंजुतर मधुकर श्रेनी।
त्रिबिध बयारि बहइ सुख देनी॥


वे कल्पवृक्षके समान स्वाभाविक ही सुन्दर हैं। मानो वे देवताओंके वन (नन्दनवन) को छोड़कर आये हों। भौंरोंकी पंक्तियाँ बहुत ही सुन्दर गुंजार करती हैं और सुख देनेवाली शीतल, मन्द, सुगन्धित हवा चलती रहती है।॥ ४॥

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