रामायण >> श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (अयोध्याकाण्ड)

श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (अयोध्याकाण्ड)

गोस्वामी तुलसीदास

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2020
पृष्ठ :0
मुखपृष्ठ :
पुस्तक क्रमांक : 10
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भारत की सर्वाधिक प्रचलित रामायण। द्वितीय सोपान अयोध्याकाण्ड

दो०- नीलकंठ कलकंठ सुक चातक चक्क चकोर।
भाँति भाँति बोलहिं बिहग श्रवन सुखद चित चोर॥१३७॥


नीलकण्ठ, कोयल, तोते, पपीहे, चकवे और चकोर आदि पक्षी कानों को सुख देनेवाली और चित्त को चुरानेवाली तरह-तरह की बोलियाँ बोलते हैं॥ १३७॥

करि केहरि कपि कोल कुरंगा।
बिगतबैर बिचरहिं सब संगा॥
फिरत अहेर राम छबि देखी।
होहिं मुदित मृग बंद बिसेषी॥


हाथी, सिंह, बंदर, सूअर और हिरन, ये सब वैर छोड़कर साथ-साथ विचरते हैं। शिकार के लिये फिरते हुए श्रीरामचन्द्रजी की छवि को देखकर पशुओं के समूह विशेष आनन्दित होते हैं॥१॥

बिबुध बिपिन जहँ लगि जग माहीं।
देखि रामबनु सकल सिहाहीं॥
सुरसरि सरसइ दिनकर कन्या।
मेकलसुता गोदावरि धन्या॥


जगत्में जहाँतक (जितने) देवताओंके वन हैं, सब श्रीरामजीके वनको देखकर सिहाते हैं। गङ्गा, सरस्वती, सूर्यकुमारी यमुना, नर्मदा, गोदावरी आदि धन्य (पुण्यमयी) नदियाँ,॥ २॥

सब सर सिंधु नदी नद नाना।
मंदाकिनि कर करहिं बखाना॥
उदय अस्त गिरि अरु कैलासू।
मंदर मेरु सकल सुरबासू॥


सारे तालाब, समुद्र, नदी और अनेकों नद सब मन्दाकिनीकी बड़ाई करते हैं। उदयाचल, अस्ताचल, कैलास, मन्दराचल और सुमेरु आदि सब, जो देवताओं के रहने के स्थान हैं,॥३॥

सैल हिमाचल आदिक जेते।
चित्रकूट जसु गावहिं तेते॥
बिंधि मुदित मन सुखु न समाई।
श्रम बिनु बिपुल बड़ाई पाई॥


और हिमालय आदि जितने पर्वत हैं, सभी चित्रकूट का यश गाते हैं। विन्ध्याचल बड़ा आनन्दित है, उसके मन में सुख समाता नहीं; क्योंकि उसने बिना परिश्रम ही बहुत बड़ी बड़ाई पा ली है।॥ ४॥

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