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रामायण >> श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (अयोध्याकाण्ड) श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (अयोध्याकाण्ड)गोस्वामी तुलसीदास
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भारत की सर्वाधिक प्रचलित रामायण। द्वितीय सोपान अयोध्याकाण्ड
दो०- चित्रकूट के बिहग मृग बेलि बिटप तृन जाति।
पुन्य पुंज सब धन्य अस कहहिं देव दिन राति॥१३८॥
पुन्य पुंज सब धन्य अस कहहिं देव दिन राति॥१३८॥
चित्रकूटके पक्षी, पशु, बेल, वृक्ष, तृण-अंकुरादिकी सभी जातियाँ पुण्य की राशि
हैं और धन्य हैं-देवता दिन-रात ऐसा कहते हैं॥१३८॥
नयनवंत रघुबरहि बिलोकी।
पाइ जनम फल होहिं बिसोकी।
परसि चरन रज अचर सुखारी।
भए परम पद के अधिकारी।
पाइ जनम फल होहिं बिसोकी।
परसि चरन रज अचर सुखारी।
भए परम पद के अधिकारी।
आँखोंवाले जीव श्रीरामचन्द्रजीको देखकर जन्मका फल पाकर शोकरहित हो जाते हैं, और
अचर (पर्वत, वृक्ष, भूमि, नदी आदि) भगवान्की चरण-रजका स्पर्श पाकर सुखी होते
हैं। यों सभी परमपद (मोक्ष) के अधिकारी हो गये॥ १॥
सो बनु सैलु सुभायँ सुहावन।
मंगलमय अति पावन पावन॥
महिमा कहिअ कवनि बिधि तासू।
सुखसागर जहँ कीन्ह निवासू॥
मंगलमय अति पावन पावन॥
महिमा कहिअ कवनि बिधि तासू।
सुखसागर जहँ कीन्ह निवासू॥
वह वन और पर्वत स्वाभाविक ही सुन्दर, मङ्गलमय और अत्यन्त पवित्रों को भी पवित्र
करनेवाला है। उसकी महिमा किस प्रकार कही जाय, जहाँ सुख के समुद्र श्रीरामजी ने
निवास किया है॥२॥
पय पयोधि तजि अवध बिहाई।
जहँ सिय लखनु रामु रहे आई॥
कहि न सकहिं सुषमा जसि कानन।
जौं सत सहस होहिं सहसानन॥
जहँ सिय लखनु रामु रहे आई॥
कहि न सकहिं सुषमा जसि कानन।
जौं सत सहस होहिं सहसानन॥
क्षीरसागरको त्यागकर और अयोध्या को छोड़कर जहाँ सीताजी, लक्ष्मणजी और
श्रीरामचन्द्रजी आकर रहे, उस वन की जैसी परम शोभा है, उसको हजार मुख वाले जो
लाख शेषजी हों तो वे भी नहीं कह सकते॥३॥
सो मैं बरनि कहाँ बिधि केहीं।
डाबर कमठ कि मंदर लेहीं॥
सेवहिं लखनु करम मन बानी।
जाइ न सीलु सनेहु बखानी॥
डाबर कमठ कि मंदर लेहीं॥
सेवहिं लखनु करम मन बानी।
जाइ न सीलु सनेहु बखानी॥
उसे भला, मैं किस प्रकार से वर्णन करके कह सकता हूँ। कहीं पोखरे का [क्षुद्र]
कछुआ भी मन्दराचल उठा सकता है? लक्ष्मणजी मन, वचन और कर्म से श्रीरामचन्द्रजी
की सेवा करते हैं। उनके शील और स्नेह का वर्णन नहीं किया जा सकता॥४॥
दो०- छिनु छिनु लखि सिय राम पद जानि आपु पर नेहु।
करत न सपनेहुँ लखनु चितु बंधु मातु पितु गेहु॥१३९॥
करत न सपनेहुँ लखनु चितु बंधु मातु पितु गेहु॥१३९॥
क्षण-क्षण पर श्रीसीतारामजी के चरणों को देखकर और अपने ऊपर उनका स्नेह जानकर
लक्ष्मणजी स्वप्न में भी भाइयों, माता-पिता और घर की याद नहीं करते॥१३९॥
राम संग सिय रहति सुखारी।
पुर परिजन गृह सुरति बिसारी॥
छिनु छिनु पिय बिधु बदनु निहारी।
प्रमुदित मनहुँ चकोर कुमारी॥
पुर परिजन गृह सुरति बिसारी॥
छिनु छिनु पिय बिधु बदनु निहारी।
प्रमुदित मनहुँ चकोर कुमारी॥
श्रीरामचन्द्रजी के साथ सीताजी अयोध्यापुरी, कुटुम्ब के लोग और घर की याद भूलकर
बहुत ही सुखी रहती हैं। क्षण-क्षणपर पति श्रीरामचन्द्रजी के चन्द्रमाके समान
मुखको देखकर वे वैसे ही परम प्रसन्न रहती हैं जैसे चकोरकुमारी (चकोरी) चन्द्रमा
को देखकर!॥१॥
नाह नेहु नित बढ़त बिलोकी।
हरषित रहति दिवस जिमि कोकी।
सिय मनु राम चरन अनुरागा।
अवध सहस सम बनु प्रिय लागा॥
हरषित रहति दिवस जिमि कोकी।
सिय मनु राम चरन अनुरागा।
अवध सहस सम बनु प्रिय लागा॥
स्वामीका प्रेम अपने प्रति नित्य बढ़ता हुआ देखकर सीताजी ऐसी हर्षित रहती हैं
जैसे दिन में चकवी! सीताजी का मन श्रीरामचन्द्रजी के चरणों में अनुरक्त है इससे
उनको वन हजारों अवधके समान प्रिय लगता है॥२॥
परनकुटी प्रिय प्रियतम संगा।
प्रिय परिवारु कुरंग बिहंगा॥
सासु ससुर सम मुनितिय मुनिबर।
असनु अमिअ सम कंद मूल फर॥
प्रिय परिवारु कुरंग बिहंगा॥
सासु ससुर सम मुनितिय मुनिबर।
असनु अमिअ सम कंद मूल फर॥
प्रियतम (श्रीरामचन्द्रजी) के साथ पर्णकुटी प्यारी लगती है। मृग और पक्षी
प्यारे कुटुम्बियों के समान लगते हैं। मुनियों की स्त्रियाँ सास के समान,
श्रेष्ठ मुनि ससुर के समान और कन्द-मूल-फलोंका आहार उनको अमृत के समान लगता
है॥३॥
नाथ साथ साँथरी सुहाई।
मयन सयन सय सम सुखदाई॥
लोकप होहिं बिलोकत जासू।
तेहि कि मोहि सक बिषय बिलासू॥
मयन सयन सय सम सुखदाई॥
लोकप होहिं बिलोकत जासू।
तेहि कि मोहि सक बिषय बिलासू॥
स्वामी के साथ सुन्दर साथरी (कुश और पत्तोंकी सेज) सैकड़ों कामदेव की सेजों के
समान सुख देने वाली है। जिनके [कृपापूर्वक] देखने मात्रसे जीव लोकपाल हो जाते
हैं, उनको कहीं भोग-विलास मोहित कर सकते हैं !॥४॥
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