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रामायण >> श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (अयोध्याकाण्ड) श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (अयोध्याकाण्ड)गोस्वामी तुलसीदास
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भारत की सर्वाधिक प्रचलित रामायण। द्वितीय सोपान अयोध्याकाण्ड
दो०- सुमिरत रामहि तजहिं जन तून सम बिषय बिलासु।
रामप्रिया जग जननि सिय कछु न आचरजु तासु॥१४०॥
रामप्रिया जग जननि सिय कछु न आचरजु तासु॥१४०॥
जिन श्रीरामचन्द्रजी का स्मरण करने से ही भक्तजन तमाम भोग-विलास को तिनके के
समान त्याग देते हैं, उन श्रीरामचन्द्रजी की प्रिय पत्नी और जगत् की माता
सीताजी के लिये यह [भोग-विलास का त्याग] कुछ भी आश्चर्य नहीं है।। १४०।।
सीय लखन जेहि बिधि सुखु लहहीं।
सोइ रघुनाथ करहिं सोइ कहहीं॥
कहहिं पुरातन कथा कहानी।
सुनहिं लखनु सिय अति सुखुमानी॥
सोइ रघुनाथ करहिं सोइ कहहीं॥
कहहिं पुरातन कथा कहानी।
सुनहिं लखनु सिय अति सुखुमानी॥
सीताजी और लक्ष्मणजी को जिस प्रकार सुख मिले, श्रीरघुनाथजी वही करते और वही
कहते हैं। भगवान् प्राचीन कथाएँ और कहानियाँ कहते हैं और लक्ष्मणजी तथा सीताजी
अत्यन्त सुख मानकर सुनते हैं॥१॥
जब जब रामु अवध सुधि करहीं।
तब तब बारि बिलोचन भरहीं।
सुमिरि मातु पितु परिजन भाई।
भरत सनेहु सीलु सेवकाई॥
तब तब बारि बिलोचन भरहीं।
सुमिरि मातु पितु परिजन भाई।
भरत सनेहु सीलु सेवकाई॥
जब-जब श्रीरामचन्द्रजी अयोध्याकी याद करते हैं, तब-तब उनके नेत्रोंमें जल भर
आता है। माता-पिता, कुटुम्बियों और भाइयों तथा भरत के प्रेम, शील और सेवाभाव को
याद करके-॥२॥
कृपासिंधु प्रभु होहिं दुखारी।
धीरजु धरहिं कुसमउ बिचारी॥
लखि सिय लखनु बिकल होइ जाहीं।
जिमि पुरुषहि अनुसर परिछाहीं॥
धीरजु धरहिं कुसमउ बिचारी॥
लखि सिय लखनु बिकल होइ जाहीं।
जिमि पुरुषहि अनुसर परिछाहीं॥
कृपाके समुद्र प्रभु श्रीरामचन्द्रजी दुःखी हो जाते हैं, किन्तु फिर कुसमय
समझकर धीरज धारण कर लेते हैं। श्रीरामचन्द्रजी को दुःखी देखकर सीताजी और
लक्ष्मणजी भी व्याकुल हो जाते हैं, जैसे किसी मनुष्य की परछाहीं उस मनुष्य के
समान ही चेष्टा करती है॥३॥
प्रिया बंधु गति लखि रघुनंदनु।
धीर कृपाल भगत उर चंदनु॥
लगे कहन कछु कथा पुनीता।
सुनि सुख लहहिं लखनु अरु सीता।
धीर कृपाल भगत उर चंदनु॥
लगे कहन कछु कथा पुनीता।
सुनि सुख लहहिं लखनु अरु सीता।
तब धीर,कृपालु और भक्तोंके हृदयों को शीतल करनेके लिये चन्दनरूप रघुकुल को
आनन्दित करनेवाले श्रीरामचन्द्रजी प्यारी पत्नी और भाई लक्ष्मण की दशा देखकर
कुछ पवित्र कथाएँ कहने लगते हैं,जिन्हें सुनकर लक्ष्मणजी और सीताजी सुख प्राप्त
करते हैं।। ४॥
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