रामायण >> श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (अयोध्याकाण्ड)

श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (अयोध्याकाण्ड)

गोस्वामी तुलसीदास

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2020
पृष्ठ :0
मुखपृष्ठ :
पुस्तक क्रमांक : 10
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भारत की सर्वाधिक प्रचलित रामायण। द्वितीय सोपान अयोध्याकाण्ड

दो०- हृदउ न बिदरेउ पंक जिमि बिछुरत प्रीतमु नीरु।
जानत हौं मोहि दीन्ह बिधि यहु जातना सरीरु॥१४६॥


प्रियतम (श्रीरामजी) रूपी जल के बिछुड़ते ही मेरा हृदय कीचड़ की तरह फट नहीं गया, इससे मैं जानता हूँ कि विधाताने मुझे यह 'यातनाशरीर' ही दिया है [जो पापी जीवोंको नरक भोगनेके लिये मिलता है]॥ १४६॥

एहि बिधि करत पंथ पछितावा।
तमसा तीर तुरत रथु आवा॥
बिदा किए करि बिनय निषादा।
फिरे पायँ परि बिकल बिषादा।


सुमन्त्र इस प्रकार मार्ग में पछतावा कर रहे थे, इतने में ही रथ तुरंत तमसा नदीके तटपर आ पहुँचा। मन्त्रीने विनय करके चारों निषादोंको विदा किया। वे विषादसे व्याकुल होते हुए सुमन्त्रके पैरों पड़कर लौटे॥१॥

पैठत नगर सचिव सकुचाई।
जनु मारेसि गुर बाँभन गाई॥
बैठि बिटप तर दिवसु गवाँवा।
साँझ समय तब अवसरु पावा॥


नगरमें प्रवेश करते मन्त्री [ग्लानिके कारण] ऐसे सकुचाते हैं, मानो गुरु, ब्राह्मण या गौको मारकर आये हों। सारा दिन एक पेड़के नीचे बैठकर बिताया। जब सन्ध्या हुई तब मौका मिला॥२॥

अवध प्रबेसु कीन्ह अँधिआरें।
पैठ भवन रथु राखि दुआरें।
जिन्ह जिन्ह समाचार सुनि पाए।
भूप द्वार रथु देखन आए।


अँधेरा होने पर उन्होंने अयोध्या प्रवेश किया और रथ को दरवाजे पर खड़ा करके वे [चुपके-से] महल में घुसे। जिन-जिन लोगों ने यह समाचार सुन पाया, वे सभी रथ देखने को राजद्वार पर आये॥३॥

रथु पहिचानि बिकल लखि घोरे।
गरहिं गात जिमि आतप ओरे॥
नगर नारि नर ब्याकुल कैसें।
निघटत नीर मीनगन जैसें॥


रथको पहचानकर और घोड़ोंको व्याकुल देखकर उनके शरीर ऐसे गले जा रहे हैं (क्षीण हो रहे हैं) जैसे घाम में ओले! नगर के स्त्री-पुरुष कैसे व्याकुल हैं जैसे जल के घटने पर मछलियाँ [व्याकुल होती हैं]॥४॥

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