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रामायण >> श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (अयोध्याकाण्ड) श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (अयोध्याकाण्ड)गोस्वामी तुलसीदास
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भारत की सर्वाधिक प्रचलित रामायण। द्वितीय सोपान अयोध्याकाण्ड
दो०- सचिव आगमनु सुनत सबु बिकल भयउ रनिवासु।
भवनु भयंकरु लाग तेहि मानहुँ प्रेत निवासु॥१४७॥
भवनु भयंकरु लाग तेहि मानहुँ प्रेत निवासु॥१४७॥
मन्त्रीका [अकेले ही] आना सुनकर सारा रनिवास व्याकुल हो गया। राजमहल उनको ऐसा
भयानक लगा मानो प्रेतोंका निवासस्थान (श्मशान) हो॥१४७॥
अति आरति सब पूँछहिं रानी।
उतरु न आव बिकल भइ बानी॥
सुनइ न श्रवन नयन नहिं सूझा।
कहहु कहाँ नृपु तेहि तेहि बूझा।
उतरु न आव बिकल भइ बानी॥
सुनइ न श्रवन नयन नहिं सूझा।
कहहु कहाँ नृपु तेहि तेहि बूझा।
अत्यन्त आर्त होकर सब रानियाँ पूछती हैं; पर सुमन्त्र को कुछ उत्तर नहीं आता,
उनकी वाणी विकल हो गयी (रुक गयी) है। न कानों से सुनायी पड़ता है और न आँखों से
कुछ सूझता है। वे जो भी सामने आता है उस-उससे पूछते हैं-कहो, राजा कहाँ हैं?॥१॥
दासिन्ह दीख सचिव बिकलाई।
कौसल्या गृहं गईं लवाई॥
जाइ सुमंत्र दीख कस राजा।
अमिअ रहित जनु चंदु बिराजा॥
कौसल्या गृहं गईं लवाई॥
जाइ सुमंत्र दीख कस राजा।
अमिअ रहित जनु चंदु बिराजा॥
दासियाँ मन्त्री को व्याकुल देखकर उन्हें कौसल्याजी के महल में लिवा गयीं।
सुमन्त्रने जाकर वहाँ राजा को कैसा [बैठे] देखा मानो बिना अमृत का चन्द्रमा
हो॥२॥
आसन सयन बिभूषन हीना।
परेउ भूमितल निपट मलीना॥
लेइ उसासु सोच एहि भाँती।
सुरपुर तें जनु खसेउ जजाती॥
परेउ भूमितल निपट मलीना॥
लेइ उसासु सोच एहि भाँती।
सुरपुर तें जनु खसेउ जजाती॥
राजा आसन, शय्या और आभूषणोंसे रहित बिलकुल मलिन (उदास) पृथ्वीपर पड़े हुए हैं।
वे लंबी साँसें लेकर इस प्रकार सोच करते हैं मानो राजा ययाति स्वर्गसे गिरकर
सोच कर रहे हों॥ ३॥
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